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भाव-विलास


शब्दार्थ—छपा—शोभा। छपाकर—चन्द्रमा। मीचु—मृत्यु। नगीच—पास, निकट। समीर—हवा, वायु। पीर—पीड़ा।

१२—विशेषोक्ति
दोहा

जाति कर्म गुन भेद की, बिकल्पता करि जाहि।
वस्तुहि बरनि दिखाइये, विशेषोक्ति कहु ताहि॥

शब्दार्थ—सरल है।

भावार्थ—जहाँ किसी वस्तु के गुण कर्मादि की विकल्पता वर्णन की जाय वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण
सवैया

जोबन व्याधु नहीं अरु बैननि, मोहनी मन्त्र नहीं अवरोह्यो।
भौंह कमान न बान बिलोचन, तानि तऊ पति कौ चितु पोह्यो॥
देव घृताची सची न रची तूं, दियो नहीं देवता को तन तो ह्यो।
तापर बीर अहीर की जाई री, तै मनमोहन कौ मन मोह्यो॥

शब्दार्थ—जोबन—यौवन। भौंह...पोह्यो—न तो तेरी भौंहे कमान हैं और न नेत्र वाण परन्तु फिर भी तुने पति का वित्त वेत्र लिया है। मोह्यो—मोहित किया।

१३—व्यतिरेक
दोहा

जहँ समान बिवि वस्तु की, कीजे भेद बखानु।
अलङ्कार व्यतिरेक सो, देव लुमति पहिचानु॥

शब्दार्थ—विवि—दो।

भावार्थ—जहाँ दो समान वस्तुओं का वर्णन कर के, एक में कुछ विशेषता वर्णन की जाय वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।