यह पृष्ठ प्रमाणित है।
१२८
भाव-विलास

 

मोह तें न्यारी कै प्यारी गुपाल के, हाथ बिचारिये री चित्त मै धरि।
जो रमनी रमनीय लगै, बसि बाके रहे सजनी रजनी भरि॥

शब्दार्थ—मारग–मार्ग, रास्ता। हेरति हौ–देख रही हूँ। किधौं–अथवा, या। ऐहै–आवेंगे। कै...करि–अथवा किसी ने उन्हें, मोहित कर अपने यहाँ रख लिया है। रमनी–रमणी, स्त्री। रमनीय लगै–अच्छी लगे। बसि रहे–बास करें, रहैं। वाके–उसके। सजनी–सखी। रजनी भर–रात भर।

३–बासकसज्जा
दोहा

जाने पिय को आइबो, निहचै चारु बिचारि।
मग देखै भूषन सजै, बासकसज्जा नारि॥

शब्दार्थ—आइबो–आना। निहचै–निश्चय। मगदेखै–बाट देखे, इन्तज़ार करे, प्रतीक्षा करे। भूषन सजै–गहने पहने।

भावार्थ—अपने पति का आना निश्चित समझकर जो नायिका गहनों आदि से सजकर, अपने पति की प्रतीक्षा करती है, उसे बासकसज्जा कहते हैं।

उदाहरण
सवैया

घोरि घनी घनसारु सों केसरि, चंदन गारि कें अंग सम्हारै।
मोतिन माँग के बार गुहै, अरु हार गुहै बलि बाल संवारै॥
देव कहैं सब भेष बनाइ कें, आइ कें फूलनि सेज सुधारै।
बैठि कहा उठि देखौ भटू, हरि आवत हैं घर आजु हमारै॥