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भाव-विलास

 

ग–लक्षिता
सवैया

जौ लगि जोबन है जग मैं, नहि तो लगि जीव सुभाव टरैगो।
'देव' यही जिय जानिये जू, जन जो करि आयो है सोई करैगो॥
कोटि करौ काई प्रान हरे बिन, हारिल की लकड़ी न हरैगो।
भूलेहूँ भौर चलावै न चित्त, जो चम्पक चौगुने फूल फरैगो॥

शब्दार्थ—जौ लगि–जब तक। जगमै–संसार में। सुभाव...टेरैगो–स्वभाव नहीं बदल सकता। जो...करैगो–जो करता आया है वहीं करेगा। कोटि करो–चाहे करोड़ों उपाय करो। भूलेहूं...फरैगो–चाहे चम्पक चौगुना फूले परन्तु भौंरा उसपर अपना मन नहीं चलावेगा।

घ–कुलटा
सवैया

छोरि दुकुल सकोरि कें अंग, मरोरि के बारनि हारिन छूटे।
मीड़ि नितंबहि पीड़ि पयोधर, दाबत दन्त रदच्छद फूटे॥
ज्यों कररी करि केलि करै, निकरै न कहूँ कुल सों किनि टूटे।
तौ लगि जाने कहा जुवती सुख, जो न जुवा दिन जामिन जूटे॥

शब्दार्थ—जुवा–युवा। जामिन–राति।

ङ–अनुसयना
दोहा

थानि हानि तिहि हानि भय, तहँ प्रिय गम अनुमान।
अनुसयना इहि विधि त्रिविध, बरनत सकल सुजान॥