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स्थायी-भाव लक्षण

कारण। ताके—उनके। जिनहिं जानि—जिनको जान लेने पर। जान्यो परै—ज्ञात होता है।

भावार्थ―धर्म से अर्थ, अर्थ से काम और काम से सुख प्राप्त होता है। सुख का कारण शृङ्गार रस है। शृङ्गार रस के कारण भाव हैं। यहाँ पर उन्ही का वर्णन किया जाता है; क्योंकि उन्हें जान लेने पर शृङ्गार सुखदायक प्रतीत होता है।

दोहा


थिति, विभाव, अनुभाव अरु, कह्यों सात्विक भाव।
संचारी अरु हाव ये, वरण्यो षड्विधि भाव॥

शब्दार्थ―कह्यो—वर्णन किये हैं। षड्विधि—छः तरह के।

भावार्थ―स्थायी, विभाव, अनुभाव, सात्विक, संचारीभाव और हाव-ये भावों के छः भेद कहे गये हैं।

१–स्थायी-भाव-लक्षण
दोहा


जो जा रस की उपज में, पहिले अंकुर होइ।
सो ताको थिति भाव है, कहत सुकवि सब कोइ॥
नवरस के थिति भाव हैं, तिनको बहु बिस्तारु।
तिन में रति थिति भाव तें, उपजत रस शृङ्गारु॥

शब्दार्थ―अंकुर होइ—पैदा होता है, उत्पन्न होता है। थिति भाव—स्थायी भाव। बहु—बहुत। बिरतारु—फैलाव, वर्णन। उपजत—पैदा होता है।