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भाव-विलास

 

४–सविभ्रमा
कवित्त

हँसत हँसत आई भावते के मन भाई,
देवकवि छवि छाई बर सोने से सरीर सों।
तैसी चन्द्रमुखी के वा चन्द्रमुख चन्द्रमा सो,
ह्वै है परे चाँदिनी औ चाँदिनी से चीरसों॥
सोंधे की सुबासु अङ्ग बासु वो उसास बासु,
आस पास वासी रही सुखद समीर सों।
कुंजत सी गुंजत गँभीर गीर तीर-तीर रहो,
रंग भवन भरी भौंरन की भीर सों॥

शब्दार्थ––भावते–प्यारे, पति। समीर–हवा। गँभीर–गहरा। भौंरन–भौंरे। भीर–झुंड।

प्रौढ़ा सुरत
सवैया

साजि सिंगारनि सेज चढ़ी, तबहीं तें सखी सब सुद्धि भुलानी।
कंचुकी के बँद छूटत जानें न, नीवी की डोरि न टूटत जानी॥
ऐसी बिमोहित ह्वै गई है जनु, जानति रातिक मै रतिमानी।
साजी कबै रसना रस केलि में, बाजी कबै बिछुवान की बानी॥

शब्दार्थ––सुद्धि भुलानी–सुधि बुधि भूल गई। कंचुकी–अँगिया। नीवी–फुंफुंदी (लंहगे की)। कबै–कब। बिछुवान–बिंछुए।