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उसने गोआ को मुसलमानों के अधिकार में देखा था। हिनोर में भी मुसलमानों का राज्य था। मंगलौर में चार हजार मुसलमान बसते थे। मद्रास की मुस्लिम जातियों का जीवन प्रारम्भ यहाँ से होता है।

नज़द वली ने तेरहवीं शताब्दी में मदुरा और त्रिचनापल्ली में बहुत से मनुष्यों को मुसलमान किया। यह शख्स तुर्क शहज़ादा था। सय्यद इब्राहीम ने तेरहवीं शताब्दी प्रारम्भ में पाण्यों पर चढ़ाई की और बारह वर्ष उसने पाण्यों पर राज्य किया। पर अन्त में वह हारा और मारा गया।

बाबा फखरुद्दीन एक साधू था जो पेन्नुकोड़ा में रहता था। उसने वहाँ के राजा को मुसलमान बनाया और मस्जिद बनाई। ११६८ ई० में मरा।

मदुरा प्रान्त में मुसलमानों ने १०५० ई० में प्रवेश किया। उनका नेता मार्लकुल मलूक था। इसके साथ एक बड़ा साधू अलियारशाह भी था, जो मदुरा की कचहरी में दफ़न है! पालेयन गाँव में एक मस्जिद है जिसके लिये ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दियों में छ गाँव धर्मादे खाते कुण पाण्य ने लगा दिये थे। यह दान सोलहवीं शताब्दी में वीरप्पा नायक ने भी जारी रखा था।

चोल मण्डल के किनारे बहुत सी मण्डियाँ बन गईं थीं और वहाँ के राजाओं ने जो सुभीते इन मुसलमान व्यापारियों को दे रखे थे--उससे उन्हें बहुत लाभ था। वस्साफ़ लिखता है कि--"मावर समुद्र के उस किनारे को कहते हैं जो कोलभ से नल्लोर तक फैला है। इसकी लम्बाई तीन सौ फरसङ्ग है। यहाँ के राजा को देव कहते हैं। जब यहाँ से बड़े-बड़े जहाज़ चीन, हिन्द और सिन्ध के मूल्यवान मालों से लदे गुज़रते हैं तो ऐसा जान पड़ता है कि ऊँचे ऊँचे पहाड़ बादवान लगाये पानी पर तैर रहे हैं। फारिस की खाड़ी व द्वीपों से ईराक़ और खुरासान, रूम और योरोप की सुन्दर चीजें यहाँ आती हैं और यहाँ से चारों ओर जाती हैं---क्योंकि यह व्यापार का केन्द्र है।" आगे चलकर वह लिखता है कि---

"कायल पहनम् में, किश के हाकिम मलिवुल इस्लाम जमालुद्दीन ने