पृष्ठ:भारत में इस्लाम.djvu/३०४

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२६५ यह पहला ही हिन्तुस्तानी राजा था, जिसने अपने समुद्र-तट की रक्षा के लिये एक जहाजी बेड़ा-जो तोपों से सज्जित था, रखा हुआ था। यह जल सेना बहुत जबर्दस्त थी, और उसके जल-सेनापति अली रजा ने मल-द्वीप के १२ हजार छोटे-छोटे टापुओं को हैदर के राज्य में मिला लिया था। वह पढ़ा-लिखा न था। बड़ी कठिनता से वह अपने नाम का पहला अक्षर 'है' लिखना सीख पाया था। पर, इसे भी वह उल्टा-सीधा लिख पाता था। फिर भी उसने योरोप के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों के दांत खट्ट कर दिये थे । उसकी स्मरण शक्ति ऐसी अलौकिक थी, कि वह एक-साथ कई काम किया करता था। एक-साथ वह तीस-चालीस मुशियों से काम लेता था। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र टीपू ने युद्ध उसी भाँति जारी रखा । अंगरेजों ने लल्लो-चप्पो करके सन्धि की । वह वीर था-पर अनु- भव-शून्य था ! उसने अंगरेजों से मित्रता की सन्धि स्थापित की, और जीता हुआ प्रान्त उन्हें लौटा दिया । कम्पनी ने उसे मैसूर का अधिकारी स्वीकार कर लिया था। कुछ दिन तो चला। पीछे जब लॉर्ड कार्नवालिस गवर्नर होकर आया तो उन्होंने देखा कि टीपू ने निजाम और मराठों से बिगाड़ कर लिया है। कॉर्नवालिस ने झट निजाम के साथ टीपू के विरुद्ध एक समझौता किया। इसके बाद उसने टीपू और मराठों में होती हुई सुलह में विघ्न डालकर मराठों से भी एक समझौता कर लिया। तीन बार उसने इगलैण्ड से कुछ गोरी फ़ौज तथा ५ लाख पौण्ड कर्ज भी मंगवाये । अब त्रावनकोर के राजा से भी युद्ध छिड़वा दिया गया, और अंगरेज़ उसकी मदद पर रहे । मुठभेड़ होने पर फिर टीपू ने अंगरेज़ी सेना को हार- पर-हार देनी आरम्भ की। अन्त में स्वयं कार्नवालिस ने सेना की बागडोर हाथ में ली। निजाम और मराठे उसकी सहायता को सेनाएँ ले-लेकर उससे मिल गये। ठीक युद्ध के समय तमाम योरोपियन अफसर और सिपाही शत्रु से मिल गये । टीपू के कुछ सेनापति और सरदार भी घूस से फोड़ लिये गये।