पृष्ठ:भारत में इस्लाम.djvu/११८

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१०६ 1 झता था कि मुझे किसी अन्य पुरुष की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं। वह सदा अनुमति देने वालों से घृणा करता था और यही कारण था कि उसके प्रिय मित्र भी आवश्यकीय घटनाओं में इसको कुछ राय देने का साहस नहीं करते थे । उसके संकल्प से परिचित होना कठिन था। वह सदा यह विचार करता था कि उसका भाग्य बड़ा प्रबल है और प्रत्येक मनुष्य उसे प्रेम की दृष्टि से देखता है। वह राग-रंग और नाच-कूद को बहुत चाहता । दारा फिरङ्गी लोगों को बहुत चाहता था, इसके अतिरिक्त जैसे कि हर मनुष्य जानता था, इसका कोई दीन नहीं था। यही कारण था कि औरङ्गजेब ने इसे काफ़िर के नाम से पुकारा। दारा पादरियों के साथ धार्मिक विषयों पर बातचीत करने और मुसलमान मौलवियों से उनका मुकाबला कराने में बड़ा आनन्द लेता था। इस दशा में वह कमरे के चारों ओर एक परदा लगा लेता था। शाहजादा पादरियों को उन लोगों की दलीलों के सामने हारता हुआ देखकर खुश होता था। दारा को ज्योतिषियों पर पूरा विश्वास था । और बहुत से ज्योतिषी उसके दरबार में रहते थे। जिनमें सबसे बड़ा मेरा मित्र था। जिसका नाम भवानीदास था। क्योंकि वह मेरे पास कई बार शराब पी जाया करता था । इस शाहजादे के दो लड़के थे । बड़ा सुलेमान शिकोह और छोटा शहर शिकोह । ये दोनों बड़ी बेगम के पेट से हुए थे जो शाही खानदान से थी। जिस समय शाहजहाँ ने प्रत्येक शहजादे को पृथक-पृथक देश बाँट दिये तो उसने दारा को काश्मीर लाहौर और काबुल का देश देकर अपने पास रख लिया। उसे इससे इतना प्रेम हो गया था कि इसे उसने बहुत से हकूक दे दिये जैसे हाथियों का लड़ाना, अपने सामने सोने चाँदी के गुर्ज रखवाना। जो केवल बादशाह के सामने ही रखे जाते हैं। अपने प्रेम को प्रकट करने के लिये उसने आज्ञा दी कि उसके राजसिंहासन के पास एक और छोटा सा सिंहासन रखा जाय, जिसपर शाहज़ादा बैठा करे। यद्यपि दारा पिता का मान करना हुआ उस पर कभी बैठना नहीं चाहता था। इसके अतिरिक्त शाहजहाँ ने अपने सब उमरा को आज्ञा दी कि सवेरे का सलाम दारा को देकर फिर शाही हुजूर में आये । कई अवसरों 1 1