पृष्ठ:भारत में इस्लाम.djvu/११३

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जब दौड़ते-दौड़ते बेदम होकर गिर गया, तब बादशाह ने कहा---जब मैं तुम्हें ठीक समय पर तनख़ा देता हूँ तब तुम क्यों नहीं देते?

एक अमीर जिसे दो हज़ारी मनसब प्राप्त था और पचास हजार रु० प्रतिमास की आय थी और उस पर बादशाह अत्यन्त प्रसन्न था। यहाँ तक कि उसे एक पुर्तगीज औरत भी बाँट दी गई थी। उसकी शाही पान देने की नौकरी थी। शाही पान के लिए बादशाह का हुक्म था कि किसी को न दिया जाये। परन्तु वह गुप्त रूप से उमरा को पान दे दिया करता था। एक दिन बादशाह ने उसे पान देते देख लिया। उस समय तो वह चुप रहा और जब वह शाम को बाग़ में पहुँचा तो बुलाकर हुक्म दिया--इसे इतना पीटो कि इसकी जान निकल जाय क्योंकि यह शाही हुक्म की परवाह नहीं करता। इसके मरने पर इसकी सब सम्पत्ति उसकी स्त्री को दे दी गई। यद्यपि शाही क़ानून से उसका अधिकारी बादशाह होता था। एक बार एक हिन्दू मुंशी की दासी को एक मुसलमान सिपाही ने ज़बर्दस्ती छीन लिया। मुन्शी ने बादशाह से अर्ज़ की। सिपाही ने कहा--दासी मेरी है। दासी ने भी यही कहा। बादशाह ने हुक्म दिया कि दासी को महल में बुलाया जाय। रात को जब बादशाह लिखने बैठे तो दासी से दवात में पानी डालने को कहा। उसने ठीक अन्दाज़ से पानी डाला। जिससे बादशाह को निश्चय हो गया कि यह अवश्य मुन्शी की दासी है और उसे मुन्शी को दिला दिया, तथा सिपाही को दण्ड दिया। बादशाह चोरों को कड़ा दण्ड देता है। वह बहुधा उन्हें सरहदी पठानों के पास भिजवा देता और पठानी कुत्तों से बदलवा लेता था। यदि अफ़सर चोर को न पकड़ पाते तो चारी का धन उन्हें गाँठ से देना पड़ता था।

कुछ लोग ऐसे जीवट वाले भी दुनिया में होते हैं जो बड़े-बड़े बाद- शाहों को हेय समझते हैं। ऐसे ही एक धृष्ट सेनापति का मजेदार किस्सा यहाँ हम लिखते हैं।

पाठकों को मालूम है कि बादशाह के सामने कोई बैठ नहीं सकता था। एक सेनापति पर बादशाह बड़े क्रुद्ध हुए और उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। वह जान की परवाह न कर बादशाह के सामने पालथी मार कर बैठ गया और बोला--अब तो मैं हुजूर का नौकर न सेवक, अब कम से