पृष्ठ:भारत में अंगरेज़ी राज - पहली जिल्द.djvu/७२१

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विल्सली और निजा़म

बेल्सली और निज़ाम निज़ाम, मराठे और टीपू सुलतान । इनमें निज़ाम को आज तक कभी भी अंगरेजों से लड़ने का साहस न हुआ था। मराठी के विषय में वेल्सली ने अपने २८ फरवरी के पत्र में डण्डास को लिखा कि:- “पेशवा का वल और प्रभाव इतनी तेजी के साथ घटता जा रहा है कि मराठों पर हमला करने की न अभी ज़रूरत है और न ऐसा करना उचित है।" टीपू के विषय में वेल्सली के २३ फरवरी के पत्र से स्पष्ट है कि वह अफरीका ही में टीपू पर हमला करने का सङ्कल्प कर चुका था। इस पत्र में वेल्मली ने यह भी लिखा कि- "टीयू के विरुद्ध लड़ने के लिए हमें दूसरे भारतीय नरेशों की मदद की ज़रूरत होगी, किन्तु निज़ाम की सेना पर विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह ऐसे मौके पर टीपू के विरुद्ध हमारा साथ देगी।" बात यह थी कि निज़ाम के पास कम्पनी की सेना के अलावा अभी तक एक अपनी स्वतन्त्र सेना भी मौजूद थी। फ्रांसीसी सनापति मौ० रेमाँ को सर जॉन शोर ने ज़बरदस्ती निजाम की इस सेना से निकलवा दिया था, फिर भी अनेक योग्य फ्रांसीसी अफसर अभी तक उस सेना में मौजूद थे। अंगरेज़ इतिहास लेखक स्वीकार करते हैं कि इस पुरानी सेना और उसके फ्रांसीसी अफसरों ने सदा बड़ी वफ़ादारी के साथ निज़ाम और उसके दरबार की सेवा की। केवल छ वर्ष पहले यही सेना टीपू के विरुद्ध अंगरेजों का भी साथ दे चुकी थी। किन्तु इस सेना की बाग अंगरेजों के हाथों में न थी, इसलिए सब से पहला काम वेल्सली के लिए यह था कि निज़ाम