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भारत में अंगरेज़ी राज

भारत में अंगरेजी राज के मुखिया चुने जाने थे। मैलकम लिखता है कि ये मुखिया आम तौर पर ऐसे लोग होते थे जो हर न्यायशील नरेश की सहायता करते थे और हर अन्यायी नरेश का साहस के साथ विरोध करते थे और गाँव के जीवन की अन्याय से रक्षा करते थे। हर श्रेणी और हर बिरादरी के लोगों में से ये पञ्च चुने जाते थे। मुद्दई और मुद्दाले दोनों को इनके चुनाव पर एतराज़ करने का हक होता था। ये पञ्चायत ही अत्यन्त प्राचीन समय से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आने के समय तक भारतीय न्याय पद्धति के राज पढे थी। भारतवासियों के चरित्र पर इनका प्रभाव बड़ा गहरा पड़ता था। मैलकम लिखता है कि- "यदि कभी किसी आपत्ति के समय कोई मनुष्य अपना घर या खेत छोड़ कर कही चला जाता था तो वह या उसकी औलाद जब चाहे अपने सोपड़े या अपने खेत पर फिर से आकर कब्ज़ा कर लेती थी, न किसी दीवार के लिए कोई झगड़ा होता था और न किसी खेत के लिए मुकदमेवाजी।"* हर किसान अपनी जमीन का पूरा मालिक समझा जाता था। मनरो लिखता है कि उस समय के भारतवासी “सरल, निष्पाप और ईमानदार होते थे और इतने सच्चे थे जितने संसार के किसी भी दूसरे देश के लोग हो सकते थे। ___+ F 1 pll ol houre, e: 15-thrld, is token porn.sion of by tire 6. et On Lultivator ithout dispute or litigeet1012 "- Nalcohl, vol 1 (1 I hd 1 100 + Simple, hamlesh lionest and having as much uuth in them as any people at the told "--AINo vo! 1 230 hd, p 100