पृष्ठ:भारत में अंगरेज़ी राज - पहली जिल्द.djvu/६५३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
३७३
लॉर्ड कॉर्नवालिस

वॉर्ड कॉर्नवालिस ३७३ भारतीय इलाके में कहीं देखने को भी न मिलती थी। किन्तु टीपू नातजरुबेकार था। विदेशियों से देश को कितना खतरा था, और उस खतरे को दूर करने के लिए अपने भारतीय पड़ोसियों से मेल बनाए रखने की कितनी ज़रूरत थी इन दोनों चीजों को वह अभी पूरी तरह न समझ पाया था। कुछ सरहदी इलाकों के बारे में मराठों और निजाम दोनों से उसके झगड़े चले आते थे, जिनमें ज्यादती चाहे किसी की भी रही हो, इसमें सन्देह नहीं टीपू अपने पड़ोसियों के साथ उस तरह का प्रेम और मेल कायम न रख सका, जिस तरह का हैदर ने रख रखा था। निजाम और मराठों के साथ टीपू के इन आपसी झगड़ों से ही कम्पनी को टीपू के खिलाफ सबसे ज़्यादा मदद मिली। कॉर्नवालिस ने सबसे पहले टोपू के विरुद्ध निज़ाम के साथ एक नया समझौता किया । इस समझौते का मतलब यह था कि कम्पनी की वह सबलीडीयरी सेना जो निज़ाम के यहाँ निज़ाम के खर्च पर रक्खी गई थी, टीपू पर हमला करने के लिए काम में लाई जा सकेगी, और निजाम टीपू पर हमला करने में अंगरेजों को मदद देगा 18 इस दरमियान टीयू और मराठों में सुलह सफाई की बातचीत हो रही थी, और यदि कॉर्नवालिस बीच में में बाधा न डालता तो निस्सन्देह सुलह हो ही को टीपू के खिलाफ गई थी। किन्तु कॉर्नवालिस खूब जानता था फोड़ना कि टीपू को वश में करना अकेले अंगरेजों और

  • Hiskarecau Sketches, br Colonel Wilks vol 111 P 38