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भारत में अंगरेज़ी राज

२८२ भारत में अंगरजी राज सन् १७७६ को वारन हेस्टिंग्स को लिख दिया कि-"पूना दरबार हमारी शर्तों पर राजी नहीं होता।" बारन हेस्टिंग्स ने जब देख लिया कि सुलह से काम नहीं चल सकता, तो अपटन के पूना रहने हुए फौरन एक हेस्टिग्म की युद्ध बहत बडे पैमाने पर जंग की तैयारियां शुरू कर को तयारी दी। कलकत्ते और मद्रास दोनों स्थानों पर पूना भेजने के लिए सनाएँ जमा की जाने लगीं। भोसले, सींधिया और होलकर, तीनों को हेस्टिग्स ने अपनी ओर फोड़ने की कोशिशें शुरू की। हैदरअली और निजाम से भी उसने गुप्त पत्र व्यवहार शुरू किया, और यह कोशिश की कि यदि हैदरअली और निज़ाम पेशवा दरबार के खिलाफ़ अंगरेजों को मदद न भी दे तो कम से कम तटस्थ रह। पूना दरबार को इन सब बातों की खबर मिलती रही। इतिहास से पता नहीं चलता कि और कौन कौन सी बातें थीं, जिनसे डर कर या मजबूर होकर अन्त में नाना फड़नवीस जैसे नीतिज्ञो ने अपने विचार बदल दिए। कर नल अपटन जिस समय निराश होकर पुरन्धर से बंगाल लौटने को तैयार हुआ, कहा जाता है कि पेशवा के मन्त्रियों ने उसे रोक लिया। ३ जून सन् १७७६ को पुरन्धर में पेशवा दरबार और कम्पनी के दरमियान एक नई सन्धि हुई, जिसमें सूरत पुरन्धर की सन्धि वाली नाजायज़ सन्धि को रह करार दिया गया, अंगरेजों ने वादा किया कि हम फिर कभी राघोबा को