पृष्ठ:भारत में अंगरेज़ी राज - पहली जिल्द.djvu/१३५

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मानव धर्म

मानव धर्म और जलालुद्दीन रूमी और शेखसादी शीराज़ी की कविताओं से कबीर निस्सन्देह भली भाँति परिचित था । कबीर के पद्यों में इन महापुरुषों और दूसरे सूफ़ियों के उपदेशों की बार बार झलक आती है। कबीर का नीचे लिखा पद्य ----- जब तू श्रायो जगत में, जगत हँसे तू रोय । अब तो ऐसी कर चलो, तू हाँसे जग रोय ॥ शेखसादी के इस मशहूर पद्य का साफ भाषान्तर है- याद दारी के वक्ते जादने तो, हमा खन्दाँ बुद्न्दो तू गिरियाँ ! आँचुनाज़ी के बाद मुर्दने तो, हमा गिरियाँ शवन्दो तू खन्दाँ । इसी तरह की और भी अनेक मिसाल कबीर के पद्यों से दी जा सकती हैं । कबीर के पद्यों में फारसी और अरबी के शब्द और सूफ़ियों की उपमाएँ और उनके अलङ्कार इधर से उधर तक भरे पड़े हैं। अहमदशाह ने कबीर के बीजक में हबीब, महबूब, आशिक, माशूक, सुसाफिर, मुक्काम, हाल, जमाल, जलाल, सानी, शराव, जहर, मेहर, रौबत, हुजूर, हैरत, नासूत, मलकृत, जबरूत, लाहूत, हाहूत, हक्क इत्यादि, इस तरह के दो सौ से ऊपर अरबी और फारसी के शब्द चुने हैं, जिन्हें कबीर ने ठीक उन्हीं माइनों में उपयोग किया है जिनमें सूफियों ने, और जिनसे साफ़ मालूम होता है कि कबीर अपने विचारों और उपदेशों के लिए मुसलमान सूफियों का किस दरजे अाभारी था। कबीर ने संस्कृत की निस्बत भाषा में अपने पद्यों को लिखना पसन्द