पृष्ठ:भारतेंदु नाटकावली.djvu/६७०

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दूसरा दृश्य

स्थान--तपोवन, लतामंडप में सत्यवान बैठा हुआ है।

(रग गीति--पीलू--धमार)

(नेपथ्य में गान)


"क्यो फकीर बन आया बे मेरे बारे जोगी।
नई बैस कोमल अंगन पर काहे भभूत रमाया बे॥
किन वे मात-पिता तेरे जोगी जिन तोहि नाहि मनाया बे।

काँचे जिय कहु काके कारन प्यारे जोग कमाया बे॥"

(चैती गौरी--तिताला)


विदेसिया बे प्रीति की रीति न जानी।

प्रीति की रीति कठिन अति प्यारे कोई बिरले पहिचानी॥


सत्यवान--यह कोमल स्वर कहाँ से कान में आया? प्रति-ध्वनि के साथ यह स्वर ऐसा गूँज रहा है कि मेरी सारी कदंबखंडी शब्द-ब्रह्ममय हो गई। बीच-बीच में मोर कुहुक-कुहुक कर और भी गूँज दूनी कर देते है। (कुछ सोचकर) हाय ! मेरा मन इस समय भी स्थिर नहीं। हाय ! प्रासादों में स्फटिक की छत पर चलने में जिनके चरण को कष्ट होता था आज वह कंटकमय पथ में नंगे पॉवों फिर रहे हैं और दुग्ध-फेन सी सेज के बदले आज मृगचर्म पर सोते हैं।