पृष्ठ:भारतेंदु नाटकावली.djvu/५२६

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४२१
मुद्राराक्षस

चंदन०---सुनो, मैं कुछ अपने दोष से नहीं मारा जाता, एक मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं, तो इस हर्ष के स्थान पर क्यों रोती है?

स्त्री----नाथ! जो यह बात है तो कुटुंब को क्यों बिदा करते हो?

चंदन०---तो फिर तुम क्या कहती हो?

स्त्री---( आँसू भरकर ) नाथ! कृपा करके मुझे भी साथ ले चलो।

चंदन०---हा! यह तुम कैसी बात कहती हो? अरे! तुम इस बालक का मुँह देखो और इसकी रक्षा करो, क्योंकि यह बिचारा कुछ भी लोकव्यवहार नहीं जानता। यह किसका मुँह देख के जीएगा?

स्त्री---इसकी रक्षा कुलदेवी करेंगी। बेटा! अब पिता फिर न मिलेंगे इससे मिलकर प्रणाम कर ले।

बालक---( पैरो पर गिरके ) पिता! मैं आपके बिना क्या करूँगा?

चंदन०---बेटा, जहाँ चाणक्य न हो वहाँ बसना।

दोनों चांडाल---( सूली खड़ी करके ) अजो चंदनदास! देखो, सूली खड़ी हुई, अब सावधान हो जाओ।

स्त्री---( रोकर ) लोगो, बचाओ! अरे ! कोई बचाओ!

चंदन०---भाइयो, तनिक ठहरो। ( स्त्री से ) अरे! अब तुम रो-रोकर क्या नंदों को स्वर्ग से बुला लोगी? अब वे लोग यहाँ नहीं हैं जो स्त्रियों पर सर्वदा दया रखते थे।