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श्रीचंद्रावली

कहा करौं का जतन बिचारौं बिनती केहि बिधि भाखौं।
'हरीचंद' प्यासी जनमन की अधरसुधा किमि चाखौं॥

भगवान्---तौ प्यारी मैं तोहि छोड़िके कहाँ जाउँगो, तू तौ मेरी स्वरूप ही है। यह सब प्रेम की शिक्षा करिबे को तेरी लीला है।

ललिता---अहा! इस समय जो मुझे आनंद हुआ है उसका अनुभव और कौन कर सकता है। जो आनंद चंद्रावली को हुआ है वही अनुभव मुझे भी होत है। सच है, जुगल के अनुग्रह बिना इस अकथ आनंद का अनुभव और किसको है?

चंद्रा०---पर नाथ, ऐसे निठुर क्यों हौ? अपनो को तुम कैसे दुखी देख सकते हो? हा! लाखों बातें सोची थीं कि जब कभी पाऊँगी तो यह कहूँगी, यह पूछूँगी, पर अाज सामने कुछ नहीं पूछा जाता!

भग०---प्यारी! मैं निठुर नहीं हूँ। मैं तो अपुने प्रेमिन को बिना मोल को दास हूँ। परंतु मोहि निहचै है के हमारे प्रेमिन को हम सों हूँ हमारो बिरह प्यारो है। ताही सो मैं हूँ बचाय जाऊँ हूँ। या निठुरता मैं जे प्रेमी हैं विन को तो प्रेम और बढ़े और जे कच्चे हैं विनकी बात खुल जाय। सो प्यारी यह बात हू दूसरेन की है। तुमारो का, तुम और हम तो एक ही हैं। न तुम हमसौं जुदी हो न