पृष्ठ:भारतेंदु नाटकावली.djvu/१६०

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प्रथम अंक

( जवनिका उठती है )

स्थान---इंद्रसभा

( बीच में गद्दी तकिया धरा हुआ, घर सना हुआ, इंद्र * आता है )

( इंद्र "यहाँ सत्य-भय एक के" यह दोहा फिर से पढ़ता हुआ इधर-उधर घूमता है )

( द्वारपाल आता है )

द्वार०---महाराज! नारदजी आते हैं।

इंद्र---आने दो, अच्छे अवसर पर आए।

द्वार०---जो आज्ञा।

[ जाता है

इंद्र---( आप ही आप ) नारदजी सारी पृथ्वी पर इधर-उधर फिरा करते हैं, इनसे सब बातो का पक्का पता लगेगा। हमने माना कि राजा हरिश्चंद्र को स्वर्ग लेने की इच्छा न हो, तथापि उसके धर्म की एक बेर परीक्षा तो लेनी चाहिए।


  • जामा, क्रीट, कुंडल और गहने पहने हुए, हाथ में वज्र ( कई फल का छोटा भाला ) लिए हुए।

छज्जेदार पगड़ी, चपकन, घेरदार पाजामा पहने, कमरबद कसे और हाथ में आसा लिए हुए।