पृष्ठ:भारतवर्ष का इतिहास भाग 1.djvu/३७८

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

भारतवर्षका इतिहास फुछ यन कर रहे हैं । हमको उनके उद्योगोंके साथ पूरी पूरी. सहानुभूति है। यूरोप और अमरीकाने बंदियोंके साथ बर्तावके सम्बंधमें बहुत कुछ उन्नति की है यद्यपि अभी बहुत अधिक उन्नति की गुञ्जायश है। ब्रिटिश-इण्डियाके घंदीगृहों में जो वाय भारतीय बंदियोंके साथ होता है वह अमरीका और जापानकी तुलनामें यहुत पाशविक हैं। इस सुधारकी बहुत ही अधिक आवश्यकता है। प्राचीन भारत के विषयमें फाहियान और घन- सांगकी साक्षी है कि जिस समय वे भारतमें आये उस समय इस देशमें शारीरिक दण्ड नहीं दिया जाता था। वरन् फाहियानके समयमें तो मृत्यु-दण्ड भी बंद हो चुका था । शारीरिक दण्डके विषयमें यवन राजदूत मगस्थनीज़ भी कहता है । स्त्रियोंका स्थान । जय कोई सुशिक्षित भारतीय यूरोप और अमरीका जाता है तो उसको यह मालूम होता है कि स्त्रियोंके विचार-विन्दुसे आधुनिक सभ्यता बहुत उन्नति- पर है और एशियाकी प्राचीन तथा अर्वाचीन सभ्यता इस विषय- में यूरोपसे यहुत पीछे है। परन्तु इस प्रश्नके यायतीय अङ्गों पर विचार करनेके पश्चात् इस विषयमें अधिक सावधानतापूर्वक सम्मति स्थिर करनेकी आवश्यकता प्रतीत होती है। स्त्रियों और पुषहोंका पश्चिमी सभ्यता स्त्रियों और पुरुषों के साम्यपर बहुत बल देती है, परन्तु यह प्रकट है कि यह सिद्धान्त सर्वथा अशुद्ध है। कुछ माननीय यूरोपीय विद्वानोंने भी-जिनको इस विषयमें प्रामाणिक समझा जाता है-स्पष्टरूपसे इस मतका प्रकाश कर दिया है। हेवेलाक एलिस सामाजिक विज्ञानके जाननेवालोंमें एक उच्च कोटिके विद्वानका नाम है.। उसने इस विचारको स्पष्टरूपसे निस्सार बतलाया है। सच तो यह है कि न पुरुष स्त्रियोंसे साम्य।