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बल्लभ स्वामी १५२० ई॰ के लगभग उत्तर हिन्दुस्थान में प्रगट हुए। चैतन्य के पीछे इन्हों ने भी विष्णु की उपासना का उपदेश किया।

वल्लभ स्वामी

यह श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार बताते थे और कहते थे कि विष्णु उन लोगों से प्रसन्न नहीं होते जो तपस्या करते, व्रत रखते या घरबार छोड़ कर जङ्गलों और पहाड़ों में रहते हैं। भगवान उन्हीं से प्रसन्न रहते हैं जो संसार के बिषयों को भोगते और सुख से अपने दिन बिताते हैं। इनके चेले बहुधा धनी साहूकार होते हैं जिनके पास भोग बिलास की सामग्री भी है और जो उसे भोगने की इच्छा भी रखते हैं।


१८—राजपूत।
(६०० ई॰ से १२०० ई॰ तक)

१—आर्य और प्राचीन हिन्दुओं के समय में राजा सरदार और सिपाही क्षत्रियजाति के होते थे। बुद्धमत के समय में भी जैसे बुद्ध जी आप थे वैसे ही बहुधा राजा और सरदार क्षत्रिय थे। कोई कोई शूद्र भी थे जैसे चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक मौर्य। बुद्ध मत के समय के मध्य से ईसा से ५०० बरस तक पश्चिम और उत्तर भारत में सिथिया या शक जाति के राजाओं का राज रहा।

२—विक्रमादित्य के समय में सिथियावालों और क्षत्रिय राजाओं और राज्यों का नाम सुनने में नहीं आता। उनकी जगह ६०० ई॰