पृष्ठ:भारतवर्ष का इतिहास.djvu/१४२

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तोड़े और देश को लूटे। वह यह चाहता था कि भले बादशाहों की तरह देश का शासन करे। बाबर अपने बचन पर दृढ़ रहता था। नीच कर्मों से उसको घृणा थी; वह सदा प्रसन्न बदन और हँसमुख रहा करता। अपने जीवन-चरित में जो उसने अपने हाथ से लिखा है वह कहता है कि जब कभी मैं लड़ाई से हार गया या मुझे किसी कार्य्य में सफलता न हुई तब भी मैं निराश न हुआ और न हाथ पर हाथ धरके बैठा ही रहा। एक और जगह लिखता है कि मनुष्य कैसे वह कर्म कर सकता है जिसमें मरने के पीछे उसके नाम पर धब्बा लगे।

१३—हिन्दुस्थान में आने पर बाबर बहुत काल तक न जिया। वह दिल्ली के सिंहासन पर चार ही बरस बैठा था कि निर्बल हो गया और बीमारी उसे सताने लगी। उसका प्यारा बेटा हुमायूं भी ऐसा बीमार पड़ गया कि बिस्तर से उठने के योग्य न रहा और ऐसा जान पड़ने लगा कि अब यह न बचेगा। बाबर के सामने एक धार्मिक सर्दार के मुंह से निकला कि, बादशाह सलामत आप के पास जो सब से महँगे दाम की चीज़ हो वह आप ईश्वर को भेंट करें और उसे प्रार्थना करें तो क्या आश्चर्य्य है जो आप के पुत्र को जिला दे। आगरे में जो सब से बड़ा हीरा हुजूर को मिला था वह दे डालिये। बाबर ने कहा कि उस बड़े हीरे से तो मुझे अपनी जान ही बहुत प्यारी है, मैं अपनी जानही क्यों न दे दूं? यह कह कर उसने अपने बेटे के पलङ्ग की तीन परिक्रमा की और बोला, हे ईश्वर मेरी जान ले और मेरे बेटे को जिला दे और यह कह कर चिल्ला उठा, बस अब रोग मेरे ऊपर आगया। यह जान पड़ता था कि मानों ईश्वरने उसकी बात सुन ली, क्योंकि उसी समय से हुमायूं अच्छा होने लगा और बाबर गिरता चला गया और उसी रोग में मर गया।