पृष्ठ:भारतवर्ष का इतिहास.djvu/१०४

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वंश के सब बादशाहों से बिशेष प्रसिद्ध हुआ है। इस ने १५ बरस राज किया। कुतुबुद्दीन की तरह यह बाल्यावस्था ही से गुलाम बना परन्तु इसने अपनी भलमंसी और बुद्धिमानी से अपने स्वामी को इतना प्रसन्न कर लिया कि इसने उसको अपनी बेटी ब्याह दी। कुतुबुद्दीन की मृत्यु के पीछे इसने उसके बेटे आरामशाह को मारडाला और राज का स्वामी बन बैठा। कुतुबुद्दीन का नायब बख़्तियार ख़िलजी कुतुबुद्दीन की ओर से बिहार और बंगाले का स्वामी था। कुतुबुद्दीन की एक बेटी उस से भी व्याही थी। कुतुबुद्दीन के मरने पर उसने सोचा कि मैं क्यों अलतमश के आधीन रहूं और बंगाले का स्वाधीन स्वामी क्यों न बन जाऊं। अलतमश और बख़्तियार ख़िलजी में लड़ाई हुई। अलतमश जीत गया और बख़्तियार को मार कर उसने अपने बेटे को बंगाले का स्वामी बनाया।

५—सिंध के स्वामी ने भी अलतमश की आधीनता से मुख मोड़ा। इसी ने सिंध जीता था और मुहम्मद ग़ोरी के समय से वहां का स्वामी चला आता था अब इसने भी सिंध देश का स्वाधीन बादशाह होना चाहा पर अलतमश से लड़ाई में हार गया। सिंधु नदी पार भागना चाहता था कि वह और उसका कुटुम्ब नदी में डूब गया।

६—इस के पीछे अलतमश ने मालवा और गुजरात के राजपूतों पर चढ़ाई की; ६ बरस तक उनके साथ लड़ा। अंत को उनको भी आधीन कर लिया और फिर दिल्ली को लौट आया और यहीं १२३२ ई॰ में मर गया। वह सुन्दर मीनार जिसे कुतुब साहेब की लाट कहते हैं कुतुबद्दीन के समय में बनने लगा परन्तु अलतमश के समय में पूरा हुआ।

७—जिस समय में अलतमश दिल्ली का स्वामी था, तातार