पृष्ठ:भामिनी विलास.djvu/६९

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विलासः१]
(४९)
भाषाटीकासहितः।

जिसने खल का सत्कार (करके उसे प्रसन्न) किया उस ने (मानो) आकाशमें वास किया, पवनमें सुंदर चित्र खींचा और पानीमें रेखा बनाई,) तात्पर्य-खल का प्रसन्न करना सर्वथैव असंभव है-इसमें 'उत्प्रेक्षा' अलंकार है)

हारं वक्षसि केनापि दत्तमज्ञेन मर्कटः।
लेढि जिघ्रति संक्षिप्य करोत्युन्नतमाननम्॥९९॥

किसी मूर्ख मनुष्य के द्वारा हृदय में (पहिनायेनगए) हार (को मुख में डाल उस) का स्वाद ले, सूंघ और (नेत्रौं के) निकट ले जाकर बानर मुख को उंचा उठाता है (अविज्ञ पुरुष को उत्तम पदार्थ देनेसे वह उसके गुणों को न जान उलटा उसका निरादर तथा नाश करता है। जो वस्तु खाने के योग्य नहीं उसे मुख में मेलना और उसके साथ अनेक प्रकार की चेष्टा करना कपिका स्वभावही है इससे 'स्वभावोक्ति' अलंकार हुआ)

मलिनेऽपि रागपूर्णां विकसितवदनामनल्पजल्पेऽपि।
त्वयि चपलेऽपि च सरसां भ्रमर कथं वा सरोजिनी त्यजसि॥१०॥

हे भ्रमर! तू कमलिनी को किस कारण से त्याग करता है? (अरे सुन) तू मलिन है (अर्थात् कृष्णवर्ण है,) तिस पै भी वह तुझसे अनुराग रखती है; तू वृथा बकवादी है (अर्थात् सर्वदा गुंजारही किया करता है;) परंतु वह विकसित