पृष्ठ:भामिनी विलास.djvu/३४

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[प्रास्ताविक-
भामिनीविलासः।

सा और निंदा दोनों प्रकट होती हैं। दोष जान त्याग नहीं करता यह सुझाना तो निंदा हुई और दोषयुक्त शरण आये हुए मनुष्य को अंगीकार करके प्रतिपालन करता है यह कहना प्रशंसा हुई)

कलभ तवांतिकमागतमलिमेनं मा कदाप्यवज्ञासीः।
अपि दानसुंदराणां द्विपधुर्याणामयं शिरोधार्य्यः२७॥

हे गजशावक! तेरे निकट आए हुए इस भ्रमर की कदापि अवज्ञा न कर, इसे श्रेष्ठ मत्त गज भी अपने शिर पर धारण करते हैं (अल्प दानी के पास यदि दैव वशात् कोई गुणी गया तो उसकी इच्छा सुफल करनी चाहिए क्योंकि उसका मान महान दानशूर भी करते हैं)

अमरतरुकुसुमसौरभसेवनसंपूर्णसकलकामस्य। पुष्पांतरसेवेयं भ्रमरस्य विडम्बना महती॥२८॥

कल्पद्रुम के पुष्प की सौरभ के सेवन से जिस भ्रमरके सर्व कार्य फलीभूत हुए हैं उसकी, दूसरे पुष्पों की सेवा कर ने सें महा विडम्बना है (चक्रवर्ती राजाओं अथवा सत्पुरुपों का द्वार त्याग यदि कोई गुणी अपर द्वारका अवलंबन करै अथवा किसी नीच पुरुष से मित्रता संपादन करै तो उसकी विड़म्बना अवश्यही होगी)

पृष्टाः खलु परपुष्टाः परितो दृष्टाश्च विटपिनः सर्वे॥