पृष्ठ:भामिनी विलास.djvu/३२

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[प्रास्ताविक-
भामिनीविलासः।

अपनीतपरिमलांतरकथे पदं न्यस्य देवतरुकुसुमे॥
पुष्पान्तरेऽपिगन्तुं वा वाञ्छसि चेद्भ्रमर धन्योऽसि२२

हे भ्रमर! अद्वितीय सुगंधमय मंदार पुष्पमें निवास करके अपर पुष्प में तुझ जाने वाले को धन्य है (सत्संग का त्याग करके कुसंग करने वालो की इस अन्योक्ति से कवि ने व्याज स्तुति की है)

तटिनि चिराय विचारय विन्ध्यभुवस्तव पवित्रायाः॥ शुष्यंत्या अपि युक्तं किं खलु रथ्योदकादानम् २३॥

हे सरिते! तू स्वयं विचार कर की विंध्याचल के (जिस भाग से होकर तू निकली है उसभाग की) तेरी पवित्र भूमि तेरे शुष्क हो जाने पर भी क्या मार्गस्थ अल्प तडागों से जल लेने की इच्छा करेगी (अर्थात् न करैगी संत्संगती का वियोग हो जाने से भी सज्जन दुष्ट संगति कदापि अंगीकार नहीं करते)

पत्रफलपुष्पलक्ष्म्या कदाप्यदृष्टं वृतं च खलु शूकैः॥
उपसपैम भवंतं बर्बर वद कस्य लोभेन॥२४॥

हे बर्बरवृक्ष! पत्र, फल और फूल से सुशोभित तो तुझे कभी देखाही नही वरन तू उलटा कांटों से युक्त है फिर भला तू ही कह कि हम किस लोन से तेरे निकट प्राप्त हो (यदि कोई दुष्टजन कहे कि हमारे पास सज्जन क्यों नही