पृष्ठ:भट्ट निबंधावली भाग 2.djvu/६४

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

भट्ट निबन्धावली पैतोस से पैंतालीस के बीच इन दिनो जव कि इकतालीस से पचास तक मे जीवन की परमावधि है औसत निकाला जाय तो सौ मे पचहत्तर के लगभग इसी उमर में प्रयाण कर जाते होंगे। वाल्य-विवाह कायम रहे देखिये आगे चल तीस या पैंतीस अथवा चालीस ही परमायु रह जायगी। इसी उमर को अधेड़ कहेगे जब लोग नब्बे और सौ तक पहुँचते थे तब चालीस या पैतालीस ठीक ठीक उसका आधा हुआ इस समय जवानी की उमंग बलवीर्य पुरुषार्थ सब बना रहता है चढ़ती उमर का छिछोर- पन भी अब तक सिमिट आता है। चरित्र मे गुरुता, विचार मे स्थिरता, शालीनता या बुर्दवारी शील संकोच बड़ो के साथ उनका बड़ापन का बर्ताव छोटो की छोटाई का खयाल भरपूर आ जाता है। समाज मे लांग भी उसे मानने और इज्ज़त देने लगते हैं। यदि वह शुद्ध चरित्र का हे तो उसकी सब बातों पर ज़ोर आ जाता है विशेष क्या कहैं हम तो समझते हैं कि बीस या बाइस तक की उमर का पढ़ा लिखा और चालीस से पचास तक का अपट दोनो समझ मे एक से हैं। बल्कि लौकिक व्यवहार में पहिले की अपेक्षा दूसरा अधिक परिपक्क बुद्धि का होगा। खेद है कि हमारे यहाँ की जल वायु मे चिरकाल से सहानुभूति और श्रात्म-त्याग (सेम्पेथी और सेल्फ सेक्रफाइस) का वीज बहुत दिना से चला गया है ईश्वर करै जल्द ये दोनों यहाँ के जलवायु में कदाचित् आ जाय तो निश्चय है ये लोग हमारे बड़े उपकार के हों। नई उमंग वालो में बहुधा ये दोनो गुण पाये जाते भी हैं तो चालीस या पचास तक पहुंचते पहुंचते बिलकुल बुझ जाते हैं इस उमर तक टटके बने रहें तो भारत के उत्थान में फिर विलम्ब न रह जाय । वाचक वृन्द, यह तुद्र लेख इस समय हमारी लेखिनी का उमङ्ग उठ पाया सो निवेदन किया इसमें बहुत सी त्रुटियाँ भी होगी उस पर ल्यान न है यदि इसमें कोई गुण हो और कोई अच्छी शिक्षा निक्लती हो तो उस त्रुटि को श्राप भूल जायेंगे। । अगस्त: १९.5