पृष्ठ:भट्ट निबंधावली भाग 2.djvu/१०८

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११० भट्ट निबन्धावली या प्रसव भूमि है हमारे दृढ़ाग दिहातो उससे सर्वथा बचे रहते हैं । म्यूनि- सिपालिटी की असह वेदना कैसे सहना होता है कभी उन्होंने जाना ही नहीं। विष या स्वाद मे पर्गे हुये ऐयाशी करते करते पीले आम से जर्द जिनके तन की तन्दुरुस्ती-हरियाली को तरुनी-बार-विलासिनी हरिनी बन चर गई, ऐसे इन नगर निवासियों को हमारी प्रामीण मण्डली सुचित्त बैठे अपनी घरेलू बात चीत मे जीट उड़ाते हुये कहकहे मारे रही थी कि अचानक कोई शहर का रहने वाला कपट नाटक की प्रस्तावना सदृश शहरीयत के बर्ताव से ऊबा हुअा वहां पहुंचे बोला- "क्यों भइया आप लोगो ने कौन सी ऐसी तपस्या किस पुण्य भूमि में कर रक्खा है जो विषय लम्पट, मदोन्मत्त, नगर के नामी धनियों का मुख तुम्हे नहीं देखना पड़ता। न ज़ाहिरदारी और गर्व मे सने उनके बचन तुम्हें सुनना पड़ता है। न हमारे समान तुम उनकी प्रत्याशा में दौड़ा करते हो ; शान्त चित्त दिन भर मेहनत करने के उपरान्त समय से जो कुछ मिला भोजन कर टाँग फैलाय सुख की नींद सोये न. ऊधो के देने न माधो के लेने, तनजेब श्राबरवों से तुम्हें कोई सरोकार नहीं । गजीगाढा जो कुछ अपने देश मे निज की मेहनत से तैयार कर सके जसे जब तुम पहनते हो तब विलाइत के नये फेशन के चटकीले कपड़े तुम्हे फीके जंचते हैं। ऐसी ही लीपी पोती भक, साफ और सुथरी, निर्मल स्वच्छ वायु का निर्गम जहाँ कही से प्रतिहत नहीं है ; फूस की छाई तुम्हारी झोपड़ी तुम्हें वह सुख देती है जो हवा से बात करते अनलिइ गगनस्पृक् किन्तु शहर की गन्दी मैली दुर्वायु दूपित अमीरों के सतखण्डे महलों में दुर्लभ है। शहर की गन्दी गलियों की दुर्गन्धि तुम्हारे नासारन्ध्र में काहे को कभी प्रवेश पाया होगा। भाई तुम धन्य हो । अनेक चिन्ता जर्जरित बड़े से बड़े प्रभुवरों और राजा महाराजों की कीमती दस्तरखान और उमदा लज़ीज जियाफ्तों में कदाचित् वह स्वाद न मिलता होगा जो तुम्हें टटके ताज घी, खेत के तुर्त के कटे ज्वार बाजरे, जवा और पैर की ताजी रोटी में मिलता है।