पृष्ठ:भट्ट-निबन्धावली.djvu/९७

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चढ़ती उमर . हुआ, नौजवानी की उमङ्ग बड़े काम की होती है, यदि वे अपने काम समझदारी और विचार के साथ करते रहे । नववय शृङ्गार-रस का तो प्रधान सहारा है । १८ वर्ष की उमर से २५ वर्ष मे हम जो कुछ कर लेंगे वह जीवन पर्यन्त हमारे काम आवेगा । जिस ढङ्ग पर हम दुलक जायगे, जन्म भर वह ढङ्ग हमारा न बदलेगा। मुहर से आ रहे हों, मूछों की रेख भीझती हो, ऐसे वयःसन्धि मे प्राप्त की रेख कन्दर्प को कई गुना अधिक बढ़ा लेता है। इस तरह के नवयुवा या 'नवयुवती को परस्पर प्रेम-बद्ध कराने मे वह अपने पाँचों वाणो को एक साथ जव छोड़ने लगता है, वह समय जैसा नाजुक, सुहावना और प्यारा होता 'है वैसा ही भयङ्कर भी है। ऐसे समय ऑख अलग उरझना चाहती है, मन मे अलग उचाट होना प्रारम्भ हो जाता है, दोनों को परस्पर प्रणय-बन्धन मे बाँध देना हा उस समय सयानापन है। शान्ति ऐसे ही समय की सराहने लायक है। इसी से किसी ने कहा है-- नवे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः । धातुपु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ जो नये वय मे शान्त है उसी को शान्त कहना चाहिये । ४० वर्ष के उपरान्त जव इन्द्रियाँ शिथिल होने लगी, और अपने अपने विषयों की ओर से उपराम को प्राप्त होने लगी तब तो शान्ति अपने आप प्राय हमारा दामन पकड़ लेती है। घी ढरक गया, हमे रूखी ही भातो है। बुढ़ापे की शान्ति इसो भांति की है। चढ़ती जवानी की उमङ्ग का स्वरूप किसी ने इस तरह पर दिखलाया है- "चुलबुल चालाक चुस्त, चरपर छिन-छिन में होत ।" "छैले रुबीले छिछोरे ओर छोर के।" नई जवानो मे आये हुये को जब ये सब बातें न हों वरन् संजीदगी और गौरव का आदर उसके चित्त मे 'हो उसी को शा-- ___ कहना चाहिये और ऐसा ही मनुष्य समाज का अगुवा होने ला