पृष्ठ:भट्ट-निबन्धावली.djvu/११६

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. ' भट्ट-निवधावली ।', . १०२ किया जाता और माना जाता है जिसका चरित्र कहीं से किसी अंश में दूषित न हो- "वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः चारो वर्ण मे ब्राहाण गुरू या अगुवा है । तो निश्चय हुआ कि ब्राह्मण निदूषित चरित्र हो। इस समय . ब्राह्मण जो दूषित चरित्र हो गये तो और लोगों को उन पर आक्षेप करने का मौका मिल गया है। और-और प्रान्तों की हम नहीं कहते, हमारे यू० पी० में इस समय सबों की रुचि के समान अच्छे राजनैतिक अगुवा की बड़ी जरूरत है। हमारे नई उमंग वाले बिना किसी श्रगुत्रा के बिलबिला रहे हैं, कोई हाथ पकड उन्हें चलाने वाला नहीं मिलता। ___निस्सन्देह श्रगुश्रा होने का काम बड़ा टेढ़ा और विना सिंहासन का राज्य है । राजा का अटल और सुस्थिर राज्य तभी होता है जब सबों का प्रसन्न करता हुआ प्रजा का मनोरंजन हो । वैसा ही अगुया का रोब और दबदबा तभी रहेगा जब वह सवों के. मन की करेगा, . नहीं तो एक से मीठा दूसरे दल से खट्टा बना रहेगा और जिस काम . को करना चाहता है, कृतकार्य उसमें कभी न होगा। फरवरी ११