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क्रोध।


द्वारा किएगए अपने अपकारको देख 'पुनर्वारभी यह ऐसा न करैं इस प्रकार मनमें सशङ्क होकर क्रोधवश उससे बदलालेने के लिए सन्नद्ध होना चाहिए। ऐसे अवसर पर अपकार करनेवाले को तिरस्कारदृष्टि से देख शान्त रहनाही उचित है। इस प्रकारके आचरण से यह प्रमाणित होजायगा कि तुम अपने प्रतिपक्षीको नीचदृष्टि से देखते हो और तत्कृत अपायको अपायही नहीं मानते। मनोनिग्रहका अभ्यास होनेसे ऐसा व्यवहार करनेमें कोई कठिनता नहीं पड़ती।

दूसरा विषय। विशेषकरके क्रोधके कारण और निमित्त केवल तीन हैं। प्रथमकारण–अन्यकृत थोड़ेभी अपकारको बहुत मानकर विषाद करना है। जबतक मनुष्य यह नहीं समझता कि मेरा अपकार दूसरेने किया है तबतक उसे क्रोधही नहीं आता। कोमलान्तःकरण और मनस्वी मनुष्यों के प्रतिकूल अणुमात्र भी कोई बात होनेसे उन्हैं अतिशय विषाद होता है; इसी लिए वे बहुधा क्रोध के वशीभूत हो जाया करते हैं। जो मनुष्य बलिष्ट और दृढ स्वभावके होते हैं उनपर छोटी छोटी बातोंका कुछ भी प्रभाव नहीं होता अतएव उनको क्रोध भी नहीं आता। दूसरा कारण–दूसरेके द्वारा किए गये अपकारको अपने अपमानका हेतु समझना है। स्वयं अपकारसे जितना क्रोध उत्पन्न होता है उतनाही-अथवा उससे भी अधिक-अपमानसे होता है। यही कारण है कि जब मनुष्य स्पष्टतया दूसरोंकी हेलना करनेहीके निमित्तसे उनको हानि पहुंचाते हैं तब उनके क्रोधकी सीमा नही रहती। तीसरा कारण–लोकमें अपनी अकीर्त्तिका होना है। जब कोई मनुष्य यह सुनताहै कि , अमुक व्यक्ति हमारा दुर्लौकिक करनेके लिए हमारे विषय में प्रतिकूल चर्चा करता है तब उसका कोप अतिशय प्रज्वलित हो उठता है। दुःशील लोगोंसे अपनी कीर्त्ति को रक्षित रखने का एकही उपाय है। वह यह है कि कीर्त्ति ऐसी विशद और विस्तृतहो जिसको एतादृश क्षुद्रजनोंके द्वारा सहस्रशःउपाय किये जानेपर भी धक्का न पहुंचै। क्रोध शान्तकरनेका सबसे उत्तम उपाय विलम्बकरना है।