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बेकन-विचाररत्नावली।


फिर इस विषयमें कहैंगे कि क्रोधके विशेष विशेष वेग किस प्रकार रोंके जा सकते हैं; अथवा ऐसे वेगके कारण किस प्रकार मनुष्य अपकारसे बच सकते हैं। तदनन्तर दूसरे मनुष्यमें किस प्रकार क्रोध उत्पन्न कर दिया जा सकता है अथवा जागृत हुआ क्रोध किस प्रकार शान्त किया जा सकता है, इस विषयमें कुछ कहेंगे।

प्रथम विषय; क्रोधके वशीभूत होनसे मनुष्यका जीवन कैसा दुःसह होजाता है और क्रोधका परिणाम कैसा भयङ्कर होता है–इन बातोंका विचार भली भांति ध्यानपूर्वक करना चाहिए। इसके अतिरिक्त क्रोधसे बचने का अन्य उपाय नहीं है। एतादृश विचार करने का सर्वोत्तम समय वह है जब क्रोध का कुछभी वेग मनुष्यमें शेष नहीं रहनजाता; अर्थात् जिस समय क्रोधका अत्यन्ताभाव होजाता है उससमय उसके परिणामकी ओर दृष्टि देनी चाहिए। सेनेका नामक तत्ववेत्ताने क्रोधकी उपमा जीर्णवस्तुसे दीहै। जिसप्रकार जीर्णपदार्थ जिसपर गिरते हैं उसे क्षति पहुँचानेके पहले स्ववमेव टूटकर टुकड़े टुकड़े होनाते हैं उसीप्रकार क्रोधआनेपर दूसरे की अपेक्षा सर्वतोभावसे अपनाही हानि अधिक होती है। धर्मशास्त्रकी यह आज्ञा है कि मनुष्यको कभी क्षुब्ध न होना चाहिए; मनको सदैव अपने वशमें रखना चाहिए। क्षोभ होतेही, मन हाथसे निकल जाता है और आत्मसंयमन, जो मनुष्यमात्रका कर्तव्य कर्म है, वह नहीं होसकता। मनुष्योंको मधुमक्षिकाओंका सा आचरण करना सर्वथा अनुचित है। मधुमक्षिकायें क्रोध विष्ट होकर निसको दंश करती हैं वह उन्हैं दंश करतेही तुरन्त मारडालता है; अर्थात् क्रोधही उनके नाशका कारणहोता है। क्रोध करनेसे स्वयं क्रोधकरनेवालेहीकी हानि होती है अतः मनुष्यको क्रोधसे सदैव बचना चाहिये।

क्रोध एक प्रकारका महाअधम दुर्गुण है। वह विशेष करकै लड़के स्त्री वृद्ध और रोगी मनुष्योंमें अधिक पायाजाता है। जिनमें क्रोधका प्राबल्य होता है उनकी योग्यताभी अवश्यमेव कम होती है। दूसरेके