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कामजन्यप्रेम।


इन दोनोंका समावेश इस नियममें नहीं होसकता। उनमेंसे पहिला तो अवश्य अतिविषयी और निरंकुश था; परन्तु दूसरा गम्भीर और चतुर था। इनबातोंसे यह प्रमाणित होता है कि, कामजन्य प्रेमको जहां कहीं अप्रतिरुद्ध प्रवेश मिलता है वहां वह अपना प्रभाव प्रकट करता ही है; किन्तु यदि अच्छी प्रकार प्रतिबन्ध न किया जाय तो बडे बडे दुर्गम हृदयोंमें भी वह अपना सञ्चार करता है। ईश्वरकी महिमाके तथा और उत्तमोत्तम विषयोंके मनन करनेके लिए मनुष्यका जन्म हुवा है। अतः उसके द्वारा जन्मको सार्थक न करके, अपनी प्रेमपात्ररूपी एक क्षुद्र मूर्तिके सम्मुख नम्र होना अतीव अनुचित है।

यह एक आश्चर्यकी बात है कि, प्रेमाधिक्य होनेके कारण वस्तु की योग्यता अथवा अयोग्यता की ओर मनुष्यकी दृष्टिही नहीं जाती। कामजन्य प्रेमही में अतिशयोक्तियोंका सदा सर्वकाल भाषणके समय प्रयोग करना शोभा देता है; और कहीं नहीं शोभा देता। देखिये सामान्य व्यवहारमें लोग दूसरे की जितनी प्रशंसा करते हैं उससे अधिक वे स्वयं अपनी करते हैं अर्थात् औरोंसे वे अपनेको विशेष प्रशंसनीय समझते हैं; परन्तु, इस कामजन्य प्रेमकी यह विचित्रता है कि, इसके उत्पन्न होनेसे, प्रेमपात्र अपनेको जितना प्रशंसनीय समझता है, उससे भी अधिक