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संशय।


अन्धकार दोनों रहते हैं उसके मन में संशय उत्पन्न होता है। संशय उत्पन्न होतेही उसे वहां का वहीं दबा देना चाहिये; परन्तु यदि ऐसा न होसकै तो उसके ऊपर तीव्र दृष्टि तो अवश्यही रखनी चाहिये; क्योंकि संशय के कारण बुद्धि भ्रमिष्ट होजाती है; मित्रों में भेदभाव उत्पन्न होता है और काम काज में प्रतिबन्धकता आती है; जिससे व्यवहार भलीभांति नहीं चलता। संशय से राजा लोग न्यायको छोड़ अन्याय परायण होजाते हैं; पत्नी से पति मत्सर करने लगते हैं; और बुद्धिमान् मनुष्य भी आनिश्चित वृत्ति और उदासीनता को धारण करते हैं। संशय हृदय में नहीं उत्पन्न होता किन्तु मस्तिष्क में उत्पन्न होता है; इस लिये उसका प्रादुर्भाव इंगलैंड के राजा सप्तम हेनरी के समान धृष्ट और बलिष्ट पुरुषों में भी होता है। इस राजा से अधिक धृष्टस्वभाववाला और साथही संशययुक्त और कोई नहीं हुआ। संशयका अवतार जहां ऐसे ऐसे पुरुषोंमें होताहै, वहां वह बहुत कम हानि पहुँचा सकता है, क्योंकि इसप्रकारके लोग संशयकी सत्यता अथवा असत्यताको परीक्षा द्वारा निर्णय करके काम करते हैं; परन्तु भीरुस्वभावके जो लोग हैं उनमें इसका प्रवेश बहुतही शीघ्र होताहै। किसीभी विषयका पूर्ण ज्ञान नहोनेहीसे संशयकी उत्पत्ति होती है। इस लिये संशयको यथावत् मनमें न रखकर तत्सम्बन्धी अधिक ज्ञान सम्पादन पूर्वक उसका निराकरण करनाहीं समुचित है।

मनुष्य चाहते क्या हैं? क्या वे यह समझतेहैं कि जिनसे वे व्यवहार करते हैं अथवा जिनको वे नौकर रखतेहैं वे सब साधु हैं? क्या वे यह नहीं जानते कि ऐसे लोग उनके हित की अपेक्षा अपना हित साधनमें विशेष तत्पर रहैंगे? क्या उन्हैं अपना स्वार्थ नहीं सूझता? अतएव सबसे उत्तम बात यहहै, कि संशयको सत्य समझना चाहिये; परन्तु मनमें उसे असत्य निग्रह पूर्वक अपने काम काज करने चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे संशयके ऊपर अपनी सत्ता बनी रहती है। तथापि संशयके सत्य होने पर तज्जन्य अपायोंसे बचनेके