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भाषण।


स्वभावको लगाम लगाकर अपने आधीन रखना चाहिए। कटु और क्षार पदार्थोंका भेद समझना मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है। वक्रोक्ति कहने वालेसे जैसे मनुष्य डरतेहैं वैसेही उसे औरोंकी स्मरणशक्तिसेभी डरना चाहिए, क्योंकि वक्रोक्ति को मनुष्य कभी नहीं भूलते और अवसर पानेपर बदला लेनेको प्रस्तुत होजाते हैं।

जो विशेष पूँछपांछ करताहै उसके ज्ञानकी वृद्धिभी विशेष होती है, और उससे लोग सन्तुष्टभी रहते हैं। जो जिस विषयमें निष्णातहै उससे उसी विषयका प्रश्न करना चाहिए क्योंकि तत्सम्बन्धी भाषण करनेमें उसे एक प्रकारका आनन्दहोगा, और पूँछनेवालेका ज्ञानभी सतत बढ़ता रहैगा। परन्तु त्रासदायक प्रश्न करना उचित नहीं। एतादृश व्यवहार दूसरे की बलात् परीक्षा लेने की इच्छा रखनेवालोंही को शोभादेताहै।

बोलनेके समय सदैव अपनेही घोड़े को आगे न दौड़ाना चाहिए; जिसमें दूसरोंकोभी कुछ कहने का अवसर मिलै ऐसा करना परमावश्यक है। यदि किसी ऐसे धृष्ठसे काम पड़ै जो सारा समय अपनेही भाषणमें व्यतीत करना चाहता हो तो-जैसे देरतक निरर्थक नाचनेवालों को गायक रोक देते हैं-तैसेही उसे युक्तिसे स्तंभित करदेना चाहिए।

लोग जिस बात को समझते हैं कि तुम जानतेहो, उसे यदि तुमने एक बार उनसे छिपाया, तो दूसरी बार जो तुम नहीं जानते, उसे तुम जानतेहो, यह वे लोग अवश्य समझै़गे। अपने विषयमें मनुष्यको कम बोलना चाहिये। हमारे परिचयका एक पुरुष इसप्रकार तिरस्कार युक्त वचन कहा करताथा "वह मनुष्य अपने विषयमें बहुत कुछ बोलता है, अतः उसे बुद्धिमत्ता सीखनी चाहिये"। मनुष्यके लिये आत्मश्लाघा करनेका एक मात्र प्रशस्तमार्ग यह है कि वह दूसरों के सद्गुणोंकी प्रशंसा करै और विशेष करके ऐसे सद्गुणों की जो है अपनेमें वास करतेहों। ऐसा करनेसे अपनी स्तुतिकी स्तुति होजाती है और सुननेवालोंको बुराभी नहीं लगता। दूसरोंको जो बुरी लगै