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प्रवास।


तरुण लोग, नेत्रों पर परदासा डाल कर चलैंगे; प्रेक्षणीय वस्तुओं की ओर उनकी दृष्टि बहुत कम पहुँचेगी।

यह एक आश्चर्यकी बात है कि समुद्रमें जहां ऊपर आकाश और नीचे पानीके अतिरिक्त और कुछ नहीं देख पड़ता, वहां तो लोग दिनचर्य्या रखते हैं; परन्तु पृथ्वी पर जहां कितनीही दर्शनीय सामग्री हैं, वहां पर्यटन करते समय बहुधा वे दिनचर्य्यातक नहीं रखते। क्या वे यह समझते हैं कि भलीभांति अवलोकन की गई बातोंकी अपेक्षा आकस्मिक बातोंका लिख रखना अधिक उपयोगी होता है! नहीं, दिनचर्य्या अवश्य रखनी चाहिए।

विदेश जाकर, जो कुछ देखना और ध्यानमें रखना चाहिए वह यह है;–राजसभा–विशेषतः जब अन्य देशीय राजाओं के प्रतिनिधियोंका सभामें समागम होता है; न्यायालय-जिस समय वाद प्रतिवाद होता है; धर्म्माधिकारियोंके समाज; देवालय और महात्माओंके आश्रम तथा स्मरणके लिए उनमें रक्खे हुए उपलब्ध पदार्थ; छोटे बड़े सब नगरोंकी दीवारें और दुर्ग; सामुद्रिक बन्दर और घाट; पौराणिक पदार्थ और टूटी फूटी पुरानी इमारतैं; पुस्तकालय, विद्यालय, और जहां वाद विवाद अथवा व्याख्यान होते हों वह स्थान; सामुद्रिक यान, धूमपोत और उनके बेड़े; बड़े नगरोंके निकट विहारके लिए बनाए गए राजमन्दिर और उद्यान; आयुधागार, तोपखाने, गोला, बारूद आदि रखनेके स्थान; लेन देनका बाज़ार, महाजनोंकी कोठी, घोडोंका फेरना, व्यायाम भूमि, सैनिक लोगोंका अभ्यास इत्यादि, ऐसी ऐसी नाट्यशाला जहां प्रतिष्ठित घरानेके लोग जाते हों; रत्नागार, बहुमूल्य वस्त्रागार; राजाओंकी मन्त्रिसभा; अपूर्व और अप्राप्य पदार्थोंका संग्रहालय-सारांश जहां जो कुछ देखनेके योग्य हो वहां वह सब देखना चाहिए। शिक्षक अथवा नौकर को इस बातका भलीभांति अनुसन्धान कर लेना चाहिए कि कहां कहां क्या क्या वस्तु प्रेक्षणया