पृष्ठ:बृहदारण्यकोपनिषद् सटीक.djvu/६९

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अध्याय १ ब्राह्मण ३

मन्त्र: २० • एष उ एव बृहस्पतिर्वाग् वै बृहती तस्या एष पतिस्त- स्मादु बृहस्पतिः ॥ पदच्छेदः। एषः, उ, एव, बृहस्पतिः, वाक्. वै, बृहती, तस्याः, एषः, पतिः, तस्मात् , उ, बृहस्पतिः ॥ अन्वय-पदार्थ। उ-चौर । एषः एव यही मुख्य प्राण । बृहस्पतिवृहस्पति है । + हि-क्योंकि । वाक्-वाणी । वै=निश्चय करके । वृहती-वृहती है यानी वाणी का नाम बृहती है। तस्याः उसी वाणी का । एषः-यह मुख्य प्राण । पतिः-अधिपति है । उ-और । तस्मात्-तिसी कारण | + एषाम्यह प्राण । वृहस्पतिः वृहस्पति कहलाता है। भावार्थ । हे सौम्य ! यही मुख्य प्राण बृहस्पति भी है, क्योंकि वाणी बृहती कहलाती है, यानी वाणी का नाम बृहती है, बृहती का अर्थ बड़े के है, यानी व्यापक हैं, क्योंकि सबकी सिद्धि वाणी करके होती है, इस वाणी का प्राण अधिपति है, यानी वाणी प्राण के आश्रय है, विना प्राण के वाणी कुछ कार्य नहीं कर सकती है, और यही कारण है कि प्राण बृहस्पति कहलाता है, जैसे सब देवताओं में बृहस्पति श्रेष्ठ है, वैसे ही सब इन्द्रिय देवताओं में प्राण श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ मन्त्रः २१ एप उ एच ब्रह्मणस्पतिर्वाग् वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः॥ 1