पृष्ठ:बृहदारण्यकोपनिषद् सटीक.djvu/६८२

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- ६६० बृहदारण्यकोपनिषद् स० वेदाः, अभिसंपन्नाः, सम् , ह, अस्मै, पद्यते, यम् , कामम् , कामयते, यः, एवम् , वेद ।। अन्वय-पदार्थ । यः ह-जो पुरुप । वै-निश्चय करके । संपदम्-संपदा को। वेद-जानता है । + स:वह । यम्-जिस । कामम् मनोरथ को । ह-निश्चय करके । कामयते-चाहता है । अस्मै-उसके लिये । संपद्यतेह-वह मनोरथ अवश्य प्राप्त होता है । + प्रश्न:- प्रश्न । + संपत्-संपदा । का-क्या वस्तु है ? + उत्तरम्- उत्तर । श्रोत्रम् श्रोनेन्द्रिय । वै-ही । संपत्-संपदा है। हि- क्योंकि । श्रोत्रे श्रोत्र में ही। सर्वसव । वेदावेद । अभिसं. पन्ना:-संपन्न रहते हैं। यःगो । एवम् कहे हुये प्रकार । वेद-जानता है। अस्मै-उसके लिये। संपद्यते वह मनोरथ प्राप्त होता है । यम्-जिस । कामम्-मनोरथ को। + सः वह । कामयते-चाहता है। भावार्थ । जो पुरुष भलीप्रकार संपदा को जानता है वह जिस मनोरथ को चाहता है वह मनोरथ उसको प्राप्त होता है। प्रश्न-संपत् क्या यस्तु है ? उत्तर--श्रोत्र इन्द्रिय ही संपत् है, क्योंकि श्रोत्र में ही सब वेद संपन्न होते हैं । जो पुरुष कहे हुये प्रकार जानता है उसके लिये वह मनोरथ प्राप्त होता है जिसको वह चाहता है ।। ४ ।। मन्त्रः ५ यो ह वा आयतनं वेदाऽऽयतनछ, स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतन स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥