पृष्ठ:बृहदारण्यकोपनिषद् सटीक.djvu/६५४

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६४० बृहदारण्यकोपनिषद् स० पदच्छेदः। यजः, प्राणः, वे, यजः, प्रागो, हि. इमानि, सर्वाणि, भूनानि, युज्यन्ते, युध्यन्ते, ह, अस्मै, सर्वाणि, भनानि, श्रेष्ठयाय, यजुपः, सायुज्यम्, सलोकताम् , जयति, यः, एवम् , वेद ॥ अन्वय-पदार्थ। प्राणः प्राण । वै=ही । यजुः यजु । प्राणान्मारा को । इति इस प्रकार | + उपासीन-उपासना करे । हि- क्योंकि । इमानि यै । सर्वारिसर । भृनानि-प्राणी। प्राणेप्राण में ही । युज्यन्ते संमेलन करते हैं। + अनःसी से । अस्मै-इस पुरुष के निमित्त । सर्याग्गि-पय । भृतानि- प्राणी । श्रेष्ठयाय श्रेष्टता के बाले । गुज्यन्त-उधर होने हैं। या जो पुरुष । एवम् प्रेमा। बंद मानना है । + माघ । यजुपः यजु के । सायुज्यम्-मायुज्यता को । चार । सलोकताम्सलोना को । जयतिप्राप्त होना है। भावार्थ । हे शिष्य ! प्राण ही यजु है, यानी देह संबात से सम्बन्ध करनेवाला है, यजु से मतलब यहां यजुर्वेद से नहीं है, किन्नु इसका अर्थ 'युजिर योगे' धातु से है, क्योंकि शरीर और इन्द्रिय में कार्य करने की शक्ति जभी होता है जब प्राण का सम्बन्ध इनके साथ होता है। ऐसा समझ कर पुरुष प्राण की उपासना करे, क्योंकि सब प्राणीमात्र .प्राण में ही संमेलन करते हैं, और इसी कारण इस पुरुप को श्रेष्ट पदत्री देने के लिये तय्यार होते हैं, जो ऐसा जानता है, वह यजु यानी प्राण के सायुज्यता और सलोकता को प्रात होता है ॥ २ ॥