पृष्ठ:बृहदारण्यकोपनिषद् सटीक.djvu/४८८

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४७४ बृहदारण्यकोपनिषद् स० प्रात्मा । नेति नेति । नेति-नेनि । + इतिन्करके । + उ:- कहा गया है।+ सःवही । अगृहाः सप्राय है। हि-क्योंकि । + सावह । न-नहीं । गृह्यते-ग्रहण किया जा सका है। + सः वही । अशीयः पश्य है । हिआयोकि । + सः वह । न कभी नहीं । शीर्यशील होना है। + सःवह । असङ्गःसन रहित है । हिम्क्योंकि । सः यह । न-कहीं नहीं । सत्यते-घाम होता है । सःचा असितः- बन्धनरहित है। + हिक्योंकि । न-न । साय। व्यथते- पीदित होता है । न रिप्यतिन द्विमिन होता है । जनक- हे जनक ! । निश्चय करके । अभयम् नभय पद को। प्राप्ता-तुम प्राप्त । असिम्हो के हो । प्रतिमा । याज्ञवल्क्य: याज्ञवल्क्य ने । उद्यान कहा । हम्नव । वैदेहः विदेहपति । जनका जनक । उयान-योले कि । याज्ञवल्क्य हे याज्ञवल्र!त्वासापको भी। अभयम्प्रभप पद । गच्छुतात्मात होवे । भगवन्-हे पूग!। यानो पाप । ना-हमको । अभयम्-अभय प्रार। वेदयले-मिपलाने हैं। ते% आपके लिये । नमः नमस्कार । अस्तुसोचे । ऋष-हे श!। इमे यह । विदेहा: कुन विदेह देश + तव प्रति-आपके लिये हैं । अयम् यह। अहम् मैं । अस्मि-प्रापका दास हूँ। भावार्थ । इस जीवात्मा की पूर्व दिशा में जो प्राण है वह पूर्व की ओर जाता है, और जो दक्षिण दिशा में प्राण है वह दांक्षण की ओर जाता है, और जो पश्चिम दिशा में प्राण है वह पश्चिम की ओर जाता है. हमके ऊर्घ दिशा में जो प्राण है वह ऊपर को जाता है, इसके नीचे की दिशा में जो