पृष्ठ:बुद्ध और बौद्ध धर्म.djvu/२९२

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

३०५ नालन्दा विश्व-विद्यालय समय के कुछ ऐसे ही विद्वानों का भी पता लगता है। यथा-वीर- देव, जिन्हें देवपाल ने नालन्दा का प्रधानाचार्य बनाया था। पूर्वोक्त हिलसा नामक स्थान में देवपाल का एक शिलालेख मिला है, जिसमें मंजुश्रीदेव नामक एक अन्य विद्वान का भी उल्लेख है। नयपाल (१०१५ ई०) के समय में नालन्दा महाबिहार के प्रधा- नाचार्य "दीपंकर श्रीज्ञान" थे, जिन्हें भोट के राजा की प्रार्थना के अनुसार वहाँ जाना पड़ा था । नालन्दा के और भी कई पण्डितों ने बाहर जाफर ज्ञान का आलोक फैलाया था। इनका वर्णन करते हुए इत्सिंग ने लिखा है कि ये सभी समान रूप से प्रसिद्ध थे। धार्मिक आदर्श और महाविहार के विशिष्ट मन्दिर आवास भवन आदि नालन्दा महाबिहार का धार्मिक आदर्श बौद्ध धर्म का महायान सम्प्रदाय था । यहाँ सर्वास्तिवाद की प्रधानता थी । हुएनत्संग के समय में यह विद्यालय तान्त्रिक मत का केन्द्र हो रहा था। नालन्दा महाविहार की यह बहुत बड़ी खूबी है कि यद्यपि वह सर्वतोभावेन बौद्ध विद्यालय था, तथापिं सान्प्रदायिक असहिष्णुता वहाँ लेशमात्र न थी। वहाँ बौद्ध-मूर्तियों के साथ शिव-पार्वती आदि हिन्दू देव- देवियों का पाया जाना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। पाठकों को यह जानने की उत्सुकता होगी कि इतने अधिक पण्डितों और विद्यार्थियों के रहने का क्या प्रबन्ध था। अध्यापकों और छात्रों के रहने के लिये वहाँ एक-से-एक विस्तृत, विशाल और दर्शनीय भवन बने हुए थे।