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चकित जनसमुदाय कीनी 'धन्य धन्य' पुकार।
पै कुमारि यशोधरा यह लखि लियो मन मारि,
चकित नयनन पै लियो निज ऐंचि अंचल डारि

लखै जामें नाहिँ सो तिन लोचनन सोँ और
विफल अपने कुँवर को शर होत कहुँ तिहि ठौर।
जाय तिनको धनुष लीनो हाथ राजकुमार,
कसी जामें ताँत, चाँदी को बँध्यो दृढ़ तार,

सकत जाको तानि आँगुर चार सोई वीर
जासु बाहु विशाल में अति होय बल गंभीर।
बिहँसि तीर चढ़ाय बँची डोर कुँवर प्रवीन।
मिलीँ धनु की कोटि दोउ औ मूठ करकी पीन।

दियो योँ कहि फेंकि वाको दूर कुँवर उठाय-
"खेलिबे को धनुष यह तो दिया मोहि थमाय।
प्रेम परखन योग्य नहिँ यह, लखत सकल समाज।
शाक्य-अधिपति योग्य धनुष न कहा कोउ पै आज?"

एक बोल्यो "सिंहहनु को धनुष है पृथु एक,
धरो मंदिर माहिं कब सोँ कोउ न जानत नेक,
सकत नाहिं चढ़ाय जाकी कोउ पतिंचा तानि,
जो चढ़ै तो सकत वाको नाहिं कोउ संधानि"।