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इस प्रकार भाषा की दृष्टि से उर्दू की तरह हिंदी में भी दो टाट हो गए-एक विशुद्ध भाषा का व्रजस्कूल, दूसरा मिली जुली भाषा का अवध-स्कूल । अपभ्रंश या प्राकृत काल की काव्यभाषा के उदाहरणों में आजकल की भिन्न भिन्न बोलियाँ के मुख्य मुख्य रूपों के बीज या अंकुर दिखा दिए गए हैं। इनमें से ब्रज और अवधी के भेदों पर कुछ विचार करना आवश्यक है क्योंकि हिंदीकाव्य में इन्हीं दोनों का व्यवहार हुआ है। इन दोनों भाषाओं की सीमा कानपुर के पच्छिम मैनपुरी और इटावे के आस पास ठहरती है। पच्छिमी भाषाओं में जिस प्रकार व्रज सब से पूरबी है उसी प्रकार पूरबी भाषाओं में अवधी सबसे पच्छिम की है। कुछ बातों में ब्रजभाषा अपने से उत्तर की खड़ी बोली के साथ मेल खाती है और कुछ बातों में अवधी के साथ । खड़ी बोली के साथ मेल और अवधी से भेद खड़ी बोली के समान सकर्मक भूतकाल के कर्ता में व्रज- भाषा भी 'ने' चिह्न होता है चाहे काव्य में सूरदास आदि की परंपरा के विचार से उसके नियम का पालन पूर्ण रूप से न किया जाय । यह 'ने' वास्तव में करण का चिह्न है जो हिंदी में गृहीत कर्मवाच्य रूप के कारण आया है। हेमचंद्र के इस दोहे से इस बात का पता लग सकता है-जे महु दिण्णा दिअहड़ा दइएँ पवसंतेण = जो मुझे दिए गए दिन प्रवास जाते हुए दयित (पति) से। इसीके अनुसार सक० भूत० क्रिया .