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अति उछाह सोँ करन लगे नाना आयोजन
भूलि सकल निज काम धाम, निद्रा औ भोजन।

पुरदक्षिणद्वार के पास घनो
अति चित्र विचित्र वितान तनो;
जहँ तोरण खंभन पै, बिगसे
नव मंजु प्रसून के हार लसे।

पट पाट के, कंचनतार भरे,
बहु रंग के चारहु ओर पर!
शुभ सोहत बंदनवार हरे,
घट मंगल द्रव्य सजाय धरे।

पुर के सब पंकिल पंथ भए
जब चंदननीर सोँ साँचि गए।
नव पल्लव आमन के लहरैं;
सुठि पाँति पताकन की फहरैं।

नरपाल-निदेश सुन्यो सब ने-
पुरद्वार पै दंति रहैं कितने
सजि स्वर्ण वरंडक सोँ
सिगरे सित दंत चमाचम साम धरे;

धुनि धौंसन की घहराय कहाँ,
सब लेयँ कुमारहिं जाय कहाँ,