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अंतःपुर की सब स्त्रियाँ विह्वल हो विलाप करने लगीं। महारानी प्रनावती, गोमती और राजकुमारी गोपा अपनी छाती और सिर पीटने लगींं। महाराज शुद्धोदन पुत्रशोक में विह्वल हो रोने लगे। चारों ओर ढुँढ़ने के लिये लोग भेजे गए, पर कुमार न मिले और लोग ढुँढ़ ढाँढ़कर विवश हो कपिलवस्तु लौट आए। कई दिन पर छंदक भी कंठक और कुमार के वस्त्राभूपण ले कपिलवस्तु रोता पीटता आया और उसने महाराज शुद्धोदन तथा अन्य राजकुल से कुमार का सँदेसा कहा। सब लोग रोने लगे और फिर एक बार और कुमार के ढुँढ़ने के लिये आद़मी भेजे गए, पर कुमार न मिले और न उनका कुछ पता ही चला। अंत को सब लोग कुमार की अंतिम वात की प्रतीक्षा करने पर विवश हो अपने भाग्य, को दोष दे दुःखित मन हो हारकर बैठ गए।

उधर कुमार अनामा नदी पर शिखा काट गेरूआ वस्त्र पहन वहाँ से वैशाली नगर की ओर चले और शाक्या ब्राह्मणी के घर पर ठहरे। शाक्या ने कुमार का भोजनादि से उचित सत्कार किया। शाक्या के यहाँ से चल गौतम पद्मा नामक ब्राह्मणी के घर अतिथि रहे और पद्मा के यहाँ से चल वे रेवत ऋषि के आश्रम पर पहुँँचे। रेवत जी ने गौतम का उचित आतिथ्य सत्कार किया। रेवत जी के आश्रम से चलकर वे त्रिमदंडिकपुत्र राजक के घर पर ठहरे और वहाँ अतिथि रहकर आगे बढ़े। इस प्रकार कई दिनों में भैक्ष्य- चायर्या करते गौतम वैशाली नगर में पहुँँचे।

वैशाली नगर में उस समय एक परम विद्वान् पण्डित आराढ

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