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एक ही वस्तु क्यों एक मनुष्य को सुखकर और दूसरे को दुःख- दायक प्रतीत होती है ? यदि निश्चित नहीं तो ये क्या हैं ? इनका भान क्यों होता है ? इत्यादि । इस प्रकार के प्रश्न उनके मन में उत्पन्न होते थे, पर उनका कोई निश्चित समाधान वे नहीं कर पाते थे । वे दिन रात एकांत में अपने इन विचारों में मग्न रहते थे। न उन्हें आमोद से कुछ काम था न प्रमोद से। उनके चित्र में विराग था और सच्चा विराग था। जव महाराज शुद्धोदन ने देखा कि राजकुमार का चिच दिन दिन उदासीन होता जाता है, तब उन्होंने राजकुमार के लिए एक ऐसा प्रासाद बनवाया जिस में पड्ऋतु की छटा नित्य उपस्थित रहती थी और जिसे कामोद्दीपन की समस्त सामग्रियों से सुसज्जित किया था। अनेक रूप-यौवन-संपन्न और कामक्रीडा-कुशल दास दासियाँ वहाँ कुमार के चित्त को आकर्षण करने के लिए नियत की गई। नाना प्रकार के कामोद्दीपक अन्न-पान और भक्ष्य-भोज्य का प्रबंध वहाँ कर दिया गया और कुमार को उस प्रासाद में रहने के लिए आज्ञा दी गई। कुमार सिद्धार्थ उस प्रासाद में गए और रहने लगे। उस प्रासाद के सुख और वहाँ के दास दासी किसी में यह शक्ति न । थी कि उनके चित्त को सांसारिक सुखों की ओर खींच सके और कुमार को चिंतित रहने से रोक सके। कुमार वहाँ भी एकांत में बैठे अपने चित्त में यही सोचा करते थे कि संसार दुःख का सागर है । प्राणियों का जीवन क्षणभंगुर है। सव पदार्थ अपनी अवस्था बदला करते हैं। मानव-जीवन जल-बुदबुद के समान है।