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(२४२)

. ( २४२ ) ततो च पक्खस्सुपवस्सुपोस। . चातुदसिं पंचदसिं च अट्टमि ।। पटिहारिय पक्वं च पसन्नमानसो। अटुंगुपेतं सुसमत्थरूपं । प्रति पक्ष में गृहस्थ और परिव्राजक दोनों को अष्टांग धर्मयुक्त रहकर चतुर्दशी, पंचदशी (अमावस्या और पूर्णिमा) और अष्टमी और प्रतिहार्य पक्ष के दिनों में प्रसन्न चित्त होकर उपवास व्रत करना चाहिए। संन्यास का अधिकार महात्मा बुद्धदेव के विचार से उसी पुरुष, को है जिसे सच्चा वैराग्य उत्पन्न हो गया हो । वे कहते हैं- राखं विनयेथ मानुसेसु दिन्वेसु कामेसु वापि भिक्खु । अतिकम्मभवं समेञ्चधम्म

  • पाणं म हाने न घादिन्न भादियं

भुसा म भासे मप ममपासिया । अब्रह्मपरिया विरमेय मेयुना रति नभुव पिकाल भोजनं । । भालं नपारे न च गंधमारे मायं धमधेष सन्ध। . रोहि अठगिदमाहु पोसर्य ' .. बुद्धन दुखतगुता पकासित