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ऋपि मान अपनी पंक्ति में लेने के लिये पाध्य किया था, तथा इतरा के पुत्र ऐतरेय महीदास को ऋपियों से ऋपिपद प्रदान कराया था, यद्यपि जाते न रहे थे पर मंद पड़ गए थे। स्त्रियों की वह स्वतंत्रता जो उन्हें वैदिक काल में प्राप्त थी और जिसके कारण वे कितने ही मंत्रों की फर्जी हुई, उनसे छीनी जा चुकी थी और यों में यजमान के साथ उन्हें सम्मिलित होने की आशा मिलने पर भी उनसे केवल प्राज्यनिरीक्षण का ही काम लिया जाता था। शुद्ध वैदिक अध्यात्मवाद कर्मकांड के काले बादलों में छिप गया था । तपोवन ऋपि लोगों को संतानों को दक्षिण के लोभ ने इतना घेरा था कि उनका परम कर्तव्य यज्ञ कराना ही हो गया था। याज्ञिकों ने यज्ञों में वाधक होने के कारण वेदार्थ के परम साधक इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा, नाराशंसी आदि प्राचीन ऐतिहासिक प्रथों का ध्वंस कर दिया था और नरुक्तक पक्ष भी लगभग विलुम हो गया था। यातिक लोग वेद मंत्रों को स्वरसहित तोते की तरह रटते थे और उनके वास्तविक ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक आदि अर्थो पर विचार नहीं करते थे। ऐसी ही अवस्था में कौत्स आदि संशयवादी ऋपियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन लोगों ने "अनर्थ- का हि मंत्राः" इत्यादि वाक्यों से वेदों के मंत्रों को अनर्थक ठह- राया जिसका उल्लेख निरुक्त में अवतक मिलता है। इस बढ़े हुए कर्मकांड के युग में उत्तरीय भारत की अयोध्या, काशी, इंद्रप्रस्थादि राजधानियाँ अश्वमेध आदि यज्ञो में अग्निकुड की आग में पड़ते हुए चटचटाते हुए पशुओं के मांस वपा आदि