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मद में उन्मत्त पड़े हैं, उनकी आँखों पर परदा पड़ा है। वे अपने हित की बात नहीं समझते । उनकी दशा ठीक उस कुत्ते की नाई है जो बैठा हुआ सूखी हंडी चबाता है और हड्डी को रगड़ से अपने गलफड़ों से निकले हुए रक्त के स्वाद को हड्डी का खाद समझ अपनी तृप्ति मानता है। इनका दुःख देखकर तो मेरा कलेजा फटता है। पर यदि मैं उन्हें उनकी अवस्था सममाने जाऊँ तो वे मेरी वात सुनने के लिये तैयार नहीं हैं। बड़ी ही गूढ़ और चक्करदार समस्या है। क्या यह वोधि ज्ञान, जिसे मैंने इतने परिश्रम से प्राप्त किया है, मेरे साथ ही जायगा और यहीं इसका अंत हो जायगा ? पर किया क्या जाता, अधिकारी व्यक्तियों का उस समय सर्वथा अभाव ही अभाव था। पंडितगण कर्मकांड के जाल में फंसे हुए थे और इतर जनों का अध्यात्म की और कुछ ध्यान नहीं था। दोनों कोटियों में उन्हें अनधिकारी ही अनधिकारी देख पड़ते थे। इसी सोच में वे पड़े थे कि अचानक उन्हें आचार्य रुद्रक का ध्यान आया । स्मरण आते ही उनका अंतःकरण प्रेम से गदगद हो गया । उन्होंने अपने मन में कहा-'अच्छा चलो, मैं अपने इस नवाविष्कृत बोधि-ज्ञान को अपने आचार्य रुद्रक के सामने, जिनसे मैंने अध्यात्म विद्या अध्य- यन की है, गुरुदक्षिणा रूप में समर्पण करूँ। रुद्रक एक वयोवृद्ध संयमी पुरुष हैं। उनका अंतःकरण योगानुष्ठान से विमल हो गया है । उनके राग द्वष मोहादिक बंधन शिथिल पड़ गए हैं। उनकी बुद्धि शुद्ध और परिष्कृत है। अवश्य वे इस बोधिज्ञान के अधि- कारी हैं। वे यह निश्चय कर अंजपाल से चलना ही चाहते थे