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आदिमंगल। | (२९) भोग विराग का कहावै यह लोकके औ परलोकके विषे हैं स्वक् चन्दन बनितो यह आदि दैकै जेहैं तिनको अनित्यता बुद्धिकैकै तिनते जो है बैराग्य सो इहामुत्रार्थफलभोग विराग कहाँव औ लौकिक व्यापारते मनकै जो है निवृत्ति सो कहाँवै शम औबाह्य जे इन्द्रियहँ तिनकी श्रीरामचन्द्र संबंधते व्यतिरिक्त जो विषय है तेहिते निवृत्तिहोब जॉहै सो कहावै दम औ श्रीरामचन्द्रको जों ज्ञान है तेहि पूर्वक उपासनाके अर्थ विहितनेहैं नित्यादिक कर्म तिनको जो है। त्याग सो कहाँवै उपरति औ शीत उष्ण आदि देंकै जैहैं द्वन्द तिनको जो है। साहब सो कहावै तितिक्षा औ निदा आलस्य प्रमाद इनको जो है त्याग तेहि पूर्वक मनकै जोहै स्थिरता सो कहावै समाधान औ गुरु वेदांतवाक्यमें अविचल विश्वास सो कहाँव श्रद्धा औ संसारते छुठिबकी जो है इच्छा सो कहावै मुमुक्षुता ई साधना चतुष्टय जामें होय सो कहाँवै अधिकारी । । १ विषय-औ यह जीव साहबको है औरको नहीं है यह जो है ज्ञान सो यह ग्रंथमें विषय है २ सम्बन्ध- ग्रन्थको, विषय सो संबंध कौन है तात्पर्य करिकै प्रतिपाद्य प्रतिपादकभाव ॥३॥ प्रयोजन-औ यह ग्रंथमें प्रयोजन का है। कि मन माया औ अहंब्रह्म जो है ज्ञान तौनेमें बँधा है जीव सो मन माया ब्रह्मते छूटिकै रघुनाथजीको प्राप्त होय सो प्रयोजन ॥ ४ ॥ जीवको मन माया ब्रह्मते छोड़ायकै श्रीरघुनाथजीके पास प्राप्त करिबेको कही, अपनी उक्तिते कही, साहबकी उक्तिते कही, मायाकी उक्तिते कही, जीवकी उक्तितें कही, ब्रह्मकी उक्तिते कबीरजी उपदेश कियो है । औं उत्पत्ति प्रकरण कैयो प्रकारते अपने ग्रंथनमें कबीरजी कह्येहै । सो इहां कबीरजी प्रथम रमैनी में आदिकी उत्पत्ति कहैहैं । जबकुछ नहीं रह्यो है तब वही साहबकालोक रह्यो है ताहीको परम अयोध्या कहे हैं । औ सत्यलोक सांतानकलोक नांपैदलोक आदि दैकै नाना नामहैं तैने लोकमॅजे हंस हंसनी हैं गुल्मलता तृणआदि देंकै तेसब चिन्मय हैं औ परमपुरुष श्रीरामचन्द्र सबके मालिक हैं। तामें प्रमाण॥“राजाधिराजःसर्वेषां रामएवनसंशयः ॥ इतिश्रुतेः॥दूसरोप्रमाण ॥ “यत्र वृक्षलतागुल्मपत्रपुष्पफलादिकम् ॥ यत्किंचित्पक्षिशृंगादितत्सर्वभातिचिन्मयम् ॥ इतिवसिष्ठसंहितायाम्॥कबीरौनी कह्यो है ॥ सदा बसंतनहँफूलहिंकुंज