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(७०६) बघेलवंशवर्णन । पुनि रघुराने भूप मतिवाना । मुदित लाटस व बखाना ॥ हम अस जहँ तहँ सुन्यो हवाला । लेन हेतु सबको करवाला ॥ आवत लाटसो हम पहिलेहीं । सौहीं देहिं आप छैलेहीं ॥ सुनि सौहीं है लाट उवाही । देखि भली विधि कह्यो सराही । यह सौहीं केहिं देशहि केरी । कह नृप अहै फिरंग करेरी ॥ सुनत हुँनपति मन मुसक्याई । सौहीं दै वाणी यह गाई ।। तुव हथियारहि केवल तेरे । सदा रहैं हम बिन अवसरे ॥ पुनि भूपति रघुरान उदारा । करि सलाम डेरै पगु धारा । दोहा-सब भूपहुं पुनि नाय शिर, गमने शिबिर मझार ॥ | इतै हुँनपाति सैन्ययुत, है करि सपदि तयार ॥ ८९ ॥ महाराज रघुराजके, आये शिविर सिधारि ॥ होत भयो जेहि विधि सदा, तेहिते अधिक विचारि १९० करत भये सत्कार नृप, भो खुशलाट अपार ॥ वरण्यो इत संक्षेपते, भीति ग्रंथ विस्तार ॥९१॥ महाराज रघुराज पुन, कूच तहाँ ते कीन ॥ सैन्य सहित रीवां नगर, आय सबै सुख दीन ॥ ९२॥ बाढ़ अठारहको दियो, लाट विशेष निदेश ॥ गै सलामि हमेश सो, आवत जात नरेश ॥ ९३ ॥ कछु दिनमें अरजंट पुनि, चलि सोहागपुर काहिं॥ भू हि अमल काय दिय,सुयश छाय जगमाहिं ॥ ९४॥ सवैया-एक समय पगमें व्रणभो न अधीर भयो भई पीर महाई॥ जाप करें मनु बीस हजार केरै तिमि राजको काज सदाई॥ हारि गये सब देश विदेशके वैद्य हकीम मिटी न मिटाई ॥ दुरि व्यथा भै जबै रघुराज दियो शतकै रचि शम्भु सुनाई ॥ दोहा-औषध किय प्रहलाद द्विज, तालु अयोध्या खून ॥ .... थायो मुद्रा शतसहस, गाउँ उभय नहिं ऊन ॥९॥